क्या भारत की तरक्की से जल रहे हैं ये देश, UNSC में हुआ भयंकर घमासान

UNSC Reforms 2026: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता की बढ़ती वैश्विक मांग के बीच विरोधी खेमे की हलचल तेज हो गई है।

पाकिस्तान, तुर्की और इटली के नेतृत्व वाले 12 देशों के शक्तिशाली गठबंधन ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (Uniting for Consensus) ने सुरक्षा परिषद में नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने का पुरजोर विरोध किया है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में ‘कॉफी क्लब’ के नाम से चर्चित इस गुट ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र के दौरान साझा बयान जारी कर सुधारों की दिशा मोड़ने का प्रयास किया है। यह कदम ठीक ऐसे समय में उठाया गया है जब नई दिल्ली स्थायी सीट के लिए वैश्विक मंचों पर अपना कूटनीतिक दबाव लगातार बढ़ा रही है।

स्थायी सीट नहीं, सिर्फ चुने हुए सदस्यों की संख्या बढ़ाने की वकालत

यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस समूह ने अपने संयुक्त बयान में साफ किया कि वे सुरक्षा परिषद में नई स्थायी सीटें जोड़ने के पूरी तरह खिलाफ हैं। समूह का तर्क है कि नई स्थायी सदस्यता बढ़ाने के बजाय गैर-स्थायी यानी चुने हुए (Elected) सदस्यों की संख्या में इजाफा किया जाना चाहिए। साझा बयान में कहा गया कि परिषद को अधिक लोकतांत्रिक, पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाने के लिए चुनावी प्रक्रिया का विस्तार जरूरी है। समूह के अनुसार, चुनी हुई सदस्यता का दायरा बढ़ाने से अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को मजबूती मिलेगी और संप्रभु समानता का मूलभूत सिद्धांत भी अक्षुण्ण बना रहेगा।

वीटो पावर को पूरी तरह खत्म करने की उठी मांग

‘कॉफी क्लब’ ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों को मिले असीमित वीटो अधिकार पर भी कड़ा रुख अपनाया है। अपने ताजा बयान में समूह ने वीटो पावर को पूरी तरह खत्म करने की पैरवी की। इसके साथ ही समूह ने तत्काल कदम उठाने की मांग करते हुए कहा कि जब तक वीटो पूरी तरह समाप्त नहीं होता, तब तक बड़े पैमाने पर मानवाधिकार अत्याचार और युद्ध अपराध (War Crimes) जैसे संवेदनशील मामलों में इसके इस्तेमाल को तुरंत सीमित किया जाना चाहिए, ताकि वैश्विक संकटों में कार्रवाई बाधित न हो।

कौन-कौन से देश हैं इस 12 सदस्यीय ‘कॉफी क्लब’ में शामिल?

इस 12 देशों वाले समूह में पाकिस्तान, तुर्की, इटली, दक्षिण कोरिया, स्पेन, अर्जेंटीना, कनाडा, कोलंबिया, कोस्टारिका, माल्टा, मेक्सिको और सैन मैरिनो शामिल हैं। यह उन देशों का औपचारिक मंच है जो भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील (G4) जैसे मजबूत दावेदारों के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने की महत्वाकांक्षाओं पर अड़ंगा लगाते आए हैं। इसी समूह के कड़े विरोध और गतिरोध के कारण अब तक संयुक्त राष्ट्र सुधारों से जुड़ी इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशंस (IGN) की प्रक्रिया में ‘टेक्स्ट-बेस्ड बातचीत’ पर आम सहमति नहीं बन पाई है।

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एर्दोगन का ब्लूमबर्ग लेख: ‘पांच देश नहीं कर सकते पूरी दुनिया का प्रतिनिधित्व’

इस संयुक्त विरोध से पहले तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग में एक विस्तृत लेख लिखकर सुरक्षा परिषद के मौजूदा ढांचे पर सीधा प्रहार किया था। एर्दोगन ने अपने चर्चित बयान ‘दुनिया पांच से बड़ी है’ को दोहराते हुए कहा था कि मात्र पांच देश पूरी दुनिया के 8 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। उन्होंने एक कदम आगे बढ़ते हुए प्रस्ताव दिया था कि स्थायी सदस्यों के विशेषाधिकार समाप्त कर सभी सदस्यों को एक निश्चित कार्यकाल के लिए लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए चुना जाए और दोबारा चुने जाने के लिए फिर से चुनाव का प्रावधान रखा जाए।

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