ध्यान हटाओ, लाठी चलाओ: पुलिसिया नीति का नया अध्याय, UP पुलिस की बेकाबू लाठी

गाजीपुर से बाराबंकी तक: लोकतंत्र की पीठ पर लाठी

पुलिस और पुलिस की लाठी को समाज में शांति एवं कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। छोटे-मोटे अपराधी तथा मुट्ठीभर उपद्रवी अक्सर पुलिस व उसकी लाठी को देखकर चंद सेकंड में रफूचक्कर हो जाते हैं। हालांकि पावर का गलत इस्तेमाल होने पर विवाद उभरने में देर नहीं लगती। उत्तर प्रदेश में पुलिस की लाठी आजकल कुछ ज्यादा ‘चार्ज’ हो रही है।

खाकी का गुस्सा जब सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं पर बार-बार उतरने लगे तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कुछ तो गड़बड़ है। यूपी के बाराबंकी में भाजपा की छात्र विंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ताओं पर पुलिस लाठीचार्ज का मामला अभी पूरी तरह से शांत नहीं हो पाया था कि नया विवाद गाजीपुर में सामने आ गया है। जहां पुलिस की कथित पिटाई से भाजपा कार्यकर्ता की मौत हो गई है।

थाना परिसर में धरनारत नागरिकों ने जब उठने से साफ इनकार कर दिया तो पुलिस ने लाइट गुल कराकर अचानक लाठियां भांजनी शुरू कर दीं। ऐसे में गंभीर रूप से घायल भाजपा कार्यकर्ता सियाराम उपाध्यक्ष ने दम तोड़ दिया। विवाद गहराने पर थाना प्रभारी के अलावा पांच सिपाहियों को सस्पेंड करना पड़ा है। इसके पहले बाराबंकी में श्री रामस्वरूप विश्वविद्यालय में प्रदर्शन करने पर एबीवीपी कार्यकर्ताओं को पुलिस ने बेरहमी से पीट दिया था। यह मामला तब और गरमा गया जब योगी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने प्रदर्शनकारियों को ‘गुंडा’ करार दे दिया था।

पुलिस की बर्बरता ने कड़े कई अनेक सवाल

विवि प्रबंधन पर कोर्स की मान्यता के बगैर विद्यार्थियों को दाखिला देने का आरोप लगाया गया था। सीएम योगी आदित्यनाथ के गंभीर रुख के बाद विवि कैंपस में अवैध निर्माण पर बुलडोजर कार्रवाई तक देखने को मिली। इसके अलावा सूबे के सभी शिक्षण संस्थाओं में संचालित कोर्सों की मान्यता की जांच के आदेश दिए जा चुके हैं। बाराबंकी के बाद गाजीपुर में सत्ता पक्ष के समर्थकों पर पुलिस की बर्बरता ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं।

पुलिस विभाग में क्या ऐसे अधिकारी नहीं बचे हैं, जो संवेदनशील मामले को समझदारी एवं संवाद के जरिए निपटाने की काबिलियत रखते हों? यदि बात-बात पर पुलिस का धैर्य जवाब देने लगेगा तो शांति एवं कानून व्यवस्था पटरी पर आने की बजाए बेपटरी होने लगेगी। सत्ता पक्ष के कुछ जनप्रतिनिधि पूर्व में यह आरोप लगाते रहे हैं कि पुलिस-प्रशासन में कुछ अधिकारी समाजवादी पार्टी (सपा) की मानसिकता से प्रेरित हैं।

यह अधिकारी जानबूझकर ऐसे काम करा रहे हैं, जिससे सरकार की छवि खराब होती है। बाराबंकी और गाजीपुर की घटनाओं को देखकर सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों के आरोपों में दम नजर आता है। फिलहाल त्योहारी सीजन नजदीक आ रहा है।

नवरात्रि, दशहरा और दीपावली पर्व तक पुलिस-प्रशासन को अधिक सतर्क रहना पड़ेगा। ऐसे में यदि जिले-जिले में पुलिस खुद विवादों में उलझने लगेगी तो कानून व्यवस्था को संभालना मुश्किल हो सकता है। कहा जाता है कि बारिश में रपटे (बरसात में फिसलकर गिरने) और पुलिस के झपटे (पुलिस द्वारा अभद्र व्यवहार किए जाने) का तब तक बुरा नहीं मानना चाहिए जब तक कोई जान-पहचान का व्यक्ति आपको देख न ले, मगर बाराबंकी और गाजीपुर में पुलिस ने मनमानी की हद ही कर दी है। अपनी ही सरकार में पुलिस की लाठी जब पड़ती है तब दर्द अधिक होता है। चूंकि समाज में विरोधी हमेशा ताने मारते हैं कि और करो राजनीति और उठाओ अपनी प्रिय पार्टी का झंडा।

Related Articles

Back to top button