दिवाली पूजा के बाद खील-बताशों का क्या करते हैं आप; भूलकर भी न करें ये गलती, वरना रूठ जाएंगी मां लक्ष्मी!

Diwali Kheel Batashe Rules: दिवाली की रात धन की देवी मां लक्ष्मी और प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश के पूजन में खील-बताशों का भोग लगाना सदियों पुरानी परंपरा है। धान से तैयार होने के कारण खील नई फसल और अन्न समृद्धि की सूचक मानी जाती है, जबकि बताशे जीवन में मिठास और खुशहाली का प्रतीक होते हैं। धार्मिक मान्यता है कि दिवाली पर इन दोनों का भोग अर्पित करने से घर में सालभर बरकत बनी रहती है।

आमतौर पर पूजा संपन्न होने के बाद लोग इसे घर के सदस्यों में बांट देते हैं, या फिर बची सामग्री को नदी में प्रवाहित कर देते हैं। हालांकि, भारतीय परंपराओं में अन्न के सम्मान और प्रकृति के संतुलन से जुड़ा एक बेहद सुंदर नियम भी प्रचलित है, जिसमें पूजा के बाद खील-बताशों को पांच विशेष हिस्सों में बांटने का विधान बताया गया है।

इस प्राचीन मान्यता के अनुसार, पूजा के खील-बताशों को केवल घर तक सीमित रखने के बजाय पूरे परिवेश के साथ साझा किया जाना चाहिए। इसका पहला हिस्सा गौमाता के लिए निकाला जाता है, जिसे साफ-सुथरे तरीके से गाय को खिलाया जाता है। दूसरा हिस्सा किसी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति के लिए अलग रखा जाता है, ताकि त्योहार की मिठास समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके।

तीसरा हिस्सा खुले आंगन या छत पर परिंदों और पक्षियों के दाने के रूप में डाला जाता है, जिससे बेजुबानों का पेट भर सके। चौथा भाग प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जताते हुए पीपल के वृक्ष के समीप समर्पित किया जाता है, ध्यान रहे कि वहां गंदगी न फैले। अंत में पांचवां हिस्सा परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

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शास्त्रों और लोक मान्यताओं में अन्न की बर्बादी को पूरी तरह अनुचित माना गया है। कई बार लोग अज्ञानतावश बची हुई पूजा सामग्री को नदी-तालाबों में बहा देते हैं या पेड़ों के नीचे ऐसे ही छोड़ देते हैं, जिससे गंदगी फैलती है। इसके बजाय खील-बताशों को पांच भागों में बांटकर जीवों, प्रकृति, जरूरतमंदों और परिजनों में साझा करना न केवल धार्मिक दृष्टि से पुण्यदायी माना जाता है, बल्कि यह पर्यावरण और अन्न के प्रति हमारे सम्मान को भी दर्शाता है।

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