सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ शिक्षकों का विरोध

मऊ अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के आह्वान पर 15 सितम्बर को जिलेभर के शिक्षक एकजुट होकर जिलाधिकारी के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश का विरोध दर्ज कराते हुए सरकार से मांग की गई कि पुराने शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) से मुक्त किया जाए।
ज्ञातव्य है कि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि सभी सेवारत शिक्षकों को टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा। इस निर्णय में वे शिक्षक भी सम्मिलित हैं जो आरटीई एक्ट लागू होने से पहले विद्यालयों में सेवारत थे। शिक्षकों ने इस फैसले को अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि यह न केवल पूर्व नियुक्त अनुभवी शिक्षकों के साथ अन्याय है बल्कि लाखों परिवारों के समक्ष रोज़गार का संकट खड़ा करने वाला है।
शिक्षक समुदाय ने प्रधानमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में यह मांग की है किसुप्रीम कोर्ट के आदेश में आवश्यक संशोधन कर पुराने शिक्षकों को टीईटी से छूट प्रदान की जाए।
संसद में इस विषय पर विचार कर उचित संशोधन किया जाए या पुनर्विचार याचिका दायर की जाए। वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को अनावश्यक मानसिक व आर्थिक परेशानी से बचाया जाए।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि आरटीई अधिनियम 2009 की धारा 23(1) व 23(2) के तहत टीईटी की अनिवार्यता केवल नए शिक्षकों के लिए है। इसके अतिरिक्त एनसीटीई की 2010 की अधिसूचना और 2017 में हुए आरटीई संशोधन अधिनियम में भी पूर्व नियुक्त शिक्षकों को छूट दिए जाने का प्रावधान है। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी 29 जुलाई 2011 से आरटीई को लागू किया था, इसलिए इस तिथि तक नियुक्त सभी शिक्षक स्वतः ही टीईटी की अनिवार्यता से बाहर माने जाने चाहिए।
शिक्षक नेताओं ने कहा कि सरकार यदि इस पर ठोस निर्णय नहीं लेती तो लाखों शिक्षकों का भविष्य अधर में लटक जाएगा। वर्षों से बच्चों को शिक्षा देने वाले शिक्षकों की सेवाओं की अनदेखी करना शिक्षा व्यवस्था के लिए भी घातक साबित होगा।
ज्ञापन सौंपने के इस कार्यक्रम का नेतृत्व राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, जनपद मऊ के अध्यक्ष रूपेश कुमार पाण्डेय तथा महामन्त्री अरविन्द कुमार आर्य ने किया। उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने शीघ्र ही इस विषय पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया तो महासंघ देशव्यापी आंदोलन को बाध्य होगा।
शिक्षकों का यह एकमत स्वर है कि अनुभव और वर्षों की सेवा को दरकिनार कर टीईटी की अनिवार्यता थोपना शिक्षा जगत के साथ न्याय नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह इस आदेश पर पुनर्विचार कर पुराने शिक्षकों को राहत प्रदान करे।



