बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम 2025: इस बार ‘किंगमेकर’ PK नहीं, बल्कि यह ‘एक’ फ़ैक्टर तय करेगा CM

बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम 2025 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। नई विधानसभा की तस्वीर साफ होने में सिर्फ अड़तालीस घंटे बाकी हैं। नतीजे आने से पहले दिल्ली से बिहार तक सियासी हलचल तेज है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव की धड़कनें बढ़ना स्वाभाविक है। नया मुख्यमंत्री कौन बनेगा? यह सवाल हर आम मतदाता के मन में उठ रहा है। विभिन्न एजेंसियों के एग्जिट पोल्स ने जहां एनडीए के मन को प्रफुल्लित कर दिया है, वहीं इंडिया गठबंधन के खेमे में निराशा का भाव है। एग्जिट पोल्स में एनडीए की प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनने की भविष्यवाणी की गई है।

एनडीए का नया इतिहास लिखा जाना तय

परिणाम आने से पहले के अनुमान यदि सही निकले तो एनडीए का नया इतिहास लिखा जाना तय है। बिहार में बंपर मतदान आखिर किस ओर इशारा करता है? एनडीए मैदान मारेगा या इंडिया गठबंधन उलटफेर करने में कामयाब हो जाएगा? क्या प्रशांत किशोर ‘किंग मेकर’ बनकर उभरेंगे? वैसे एग्जिट पोल पर शत-प्रतिशत भरोसा नहीं किया जा सकता। बिहार में मुख्यमंत्री की दौड़ में फिलहाल नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को सबसे आगे माना जा रहा है। असली तस्वीर बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम 2025 आने पर क्लीयर हो पाएगी। चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता पक्ष व विपक्ष ने एक-दूसरे पर जमकर जुबानी हमले किए थे।

बात ‘जंगलराज’ से ‘महाजंगलराज’ तक जा पहुंची

बात ‘जंगलराज’ से ‘महाजंगलराज’ तक पहुंच गई थी। एनडीए ने जहां लालू सरकार के कार्यकाल की कड़वी यादों को जिंदा कर जंगलराज का मुद्दा खूब उठाया, वहीं इंडिया गठबंधन ने एक हाईप्रोफाइल मर्डर के बाद महाजंगलराज की बात कर नीतीश सरकार को घेरने की कोशिश की। इस बीच नीतीश कुमार का सियासी करियर भाजपा तथा आरजेडी के प्रदर्शन पर निर्भर करता है। इनमें से किसी एक दल ने भी अगर रिकॉर्ड सीट जीतने में कामयाबी हासिल कर ली तो नीतीश की दाल नहीं गल पाएगी। उन्हें मायूस होकर घर बैठना पड़ेगा। इस राज्य की धरती आज प्रवासन, बेरोजगारी और अधूरी आकांक्षाओं का प्रतीक बनकर रह गई है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि क्या बिहार की राजनीति नवीनीकरण का एक ताकतवर साधन बन सकती है?

क्या प्रशांत किशोर की भविष्यवाणी सच होगी, बिहार चुनाव का ये एग्जिट पोल चौंकाने वाला

वर्तमान में संकट अब उम्मीद का नहीं, भरोसे का नजर आता है, जहां नागरिक अब सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि अपनी आंखों के सामने बदलाव का ठोस प्रमाण मांग रहे हैं। बिहार अपनी युवा पीढ़ी को निरंतर विफल कर रहा है, जिससे एक ऐसा जनसांख्यिकीय संकट उत्पन्न हो रहा है, जिसकी विशेषता बढ़ती बेरोजगारी, मजबूरन प्रवासन और व्यवस्थागत निराशा है। राज्य की बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी है, मगर इससे भी भयावह यह है कि राज्य के अधिकांश युवाओं ने काम खोजने की उम्मीद तक छोड़ दी है। यदि मतदाता जनता के प्रति जवाबदेह शासन के निर्माण में भागीदार बनते हैं, तो वे राजनीति को नवीनीकरण का एक साधन बनने के लिए बाध्य कर सकते हैं। एक कड़वा सच यह भी है कि बिहार से आज तक युवाओं का पलायन नहीं रुक सका है।

रोजी-रोटी की आस में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में नागरिक इस राज्य से पलायन कर दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर होते हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मुंबई, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर तक बिहार के नागरिक रोजगार कर रहे हैं। बिहार में विकास की गति बेशक बढ़ी है, मगर वह उम्मीदों के अनुरूप नहीं है। रोजगार के बेहतर साधन उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। बिहार की खराब तस्वीर न बदल पाने के लिए जितना दोष राजनीतिक दलों का है, उतना आम नागरिकों का भी है। राजनीतिक दलों द्वारा बार-बार ठगे जाने के बावजूद वह अपनी गलती में सुधार नहीं कर पाए हैं।

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