year ender 2025: सिर्फ मोदी ही नहीं, साल 2025 इन 5 नेताओं के लिए रहा लकी
year ender 2025: इस साल में अगर उपलब्धियों का जिक्र किया जाए तो नेताओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही सबसे पहले याद आते हैं। मगर, ये सिलसिला 2014 से निरंतर जारी है। हां, पिछले साल के आम चुनाव में एक बड़ा धक्का जरूर लगा था, मगर बाद में स्थिति लगभग बराबरी पर आ गई।
अब अगर बिहार में नीतीश कुमार और दिल्ली में रेखा गुप्ता की सफलताओं का जिक्र करें, तो ये सब भी अंततः मोदी के खाते में ही जाएगा। दिल्ली में सत्ता हासिल करना बीजेपी के लिए साल दर साल कठिन होता जा रहा था। एक बार किरन बेदी को सीएम उम्मीदवार बनाए जाने के बाद से हर चुनाव में चेहरा मोदी ही बने रहे और मोदी के नाम पर ही सफलता भी हासिल हुई।
वैसे ही बिहार में नीतीश कुमार कभी स्वास्थ्य संबंधी कारणों से कभी अजीब हरकतों के कारण या कभी कानून-व्यवस्था पर सवालों के घेरे में रहे मगर 2020 की तरह 2025 में भी नीतीश की जीत में सबसे बड़े सहायक मोदी ही रहे।
दिल्ली चुनाव में भी बीजेपी की जीत की सुनिश्चितता मोदी ने ही पक्की की थी। जब मोदी ने दिल्लीवासियों को यकीन दिलाया कि पहले से चल रही कोई भी सरकारी कल्याणकारी योजना बंद नहीं की जाएगी, तो अरविंद केजरीवाल के बयान, जिसमें वो बार-बार कहते थे कि बीजेपी सत्ता में आने पर उनकी योजनाएं बंद कर देगी, बेअसर हो गए।
1. नीतीश कुमार ने 2025 में शानदार वापसी की
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए 2025 का विधानसभा चुनाव भी 2020 की तरह चुनौतियों से भरा रहा। मगर, जिस तरह नीतीश कुमार बिहार में एनडीए की जीत के मुख्य स्तंभ बने, वह अनोखा है।
बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से 202 सीटें एनडीए को दिलवाना बड़ी उपलब्धि है। और विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल को 25 सीटों पर सीमित करना भी नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक अनुभव और रणनीतिक चालों का परिणाम है।
चुनाव से पहले जिन राजनीतिक विरोधियों ने जेडीयू के पूरी तरह खत्म होने का दावा किया था, नीतीश कुमार ने पांच साल बाद बीजेपी के समकक्ष खड़ा कर दिया है—और बीजेपी सहित अपने सभी विरोधियों को ‘निर्विकल्पम् निरीहम्’ की स्थिति में डाल दिया है।
2. नितिन नबीन का नेतृत्व परिवारवाद की राजनीति पर बीजेपी का जवाब जैसा
नितिन नबीन ने बीजेपी के उस दावे को मजबूत किया, जिसमें कहा जाता है कि एक सामान्य कार्यकर्ता को भी पार्टी का सर्वोच्च पद मिल सकता है। यह बात एक बार अमित शाह ने समझाने की कोशिश की थी और इस संदर्भ में नितिन नबीन भी कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं थे, मगर ऐसा भी नहीं था कि वे धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव या अनुराग ठाकुर जैसे नेताओं को पीछे छोड़कर आगे बढ़ सकें।
बिहार चुनाव के दौरान परिवारवाद की राजनीति पर बहुत चर्चा हुई। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने अपने लेख में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव को परिवारवाद का प्रतीक बताया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीजेपी नेताओं को पहले ही ऐसे मामलों से सावधान कर चुके थे। तमाम चर्चाओं के बावजूद नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत को राजनीति में कदम नहीं रखने दिया।
राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन की नियुक्ति ने बीजेपी में हाई-कमांड कल्चर पर भी बहस छेड़ी है। साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि मोदी और अमित शाह का निर्णय ही बीजेपी में आम सहमति का प्रतीक है।
3. रेखा गुप्ता को बीजेपी ने धूल से उठाकर सितारे जैसा बना दिया
रेखा गुप्ता का पहली बार विधायक बनते ही मुख्यमंत्री बनना दिल्ली में पहली बार नहीं हुआ है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं आतिशी को भी यह उपलब्धि हासिल हो चुकी है। मगर मुख्यमंत्री बनने से पहले रेखा गुप्ता की तरह आतिशी कोई अनजानी हस्ती नहीं थीं। रेखा गुप्ता तो दिल्ली नगर निगम की पार्षद थीं और स्थानीय स्तर पर काम कर रही थीं।
फिर भी रेखा गुप्ता को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाना, बीजेपी द्वारा खाक से उठाकर उन्हें ऊंचाई पर पहुंचाने जैसा है। रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाना बीजेपी की परंपरा का अगला कदम है, जिसमें पहले भी कई सीनियर नेताओं को दरकिनार कर, मोहन यादव, भजनलाल शर्मा और विष्णुदेव साय जैसे नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं।
दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को चुनौती देने के लिए बीजेपी ने किरन बेदी और मनोज तिवारी से लेकर प्रवेश वर्मा तक को आजमाया, मगर अंत में बाजी रेखा गुप्ता ने मारी। किस्मत से कुछ मिल जाए तो उसे बनाए रखने के लिए कौशल की आवश्यकता होती है।
4. सीपी राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति बनना बीजेपी के विरोधियों को राजनीतिक जवाब है
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाकर बीजेपी ने अपने राजनीतिक विरोधियों की बोलती बंद कर दी थी। जगदीप धनखड़ के अचानक स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देने के बाद पूरा विपक्ष बीजेपी के विरुद्ध आक्रामक हो गया था और कई बीजेपी नेता और राज्यपाल भी इस पद के लिए कतार में थे, मगर सफल सीपी राधाकृष्णन ही रहे।
बीजेपी को ऐसे उम्मीदवार की आवश्यकता थी जो राजनीति में हर पहलू से फायदेमंद साबित हो। तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष रहे सीपी राधाकृष्णन के उपराष्ट्रपति चुने जाने में तमिलनाडु में होने जा रहे चुनाव की भी भूमिका रही। तमिलनाडु में 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं।
5. जाते साल ने एकनाथ शिंदे और अजित पवार के अच्छे दिन के संकेत दिए
बीजेपी के विरुद्ध अजित पवार पहले ही समर्पण कर चुके थे, मगर एकनाथ शिंदे निरंतर संघर्ष करते रहे। भले ही एकनाथ शिंदे को बीजेपी ने मुख्यमंत्री नहीं बनाया, मगर उन्होंने कभी हार नहीं मानी और नगर निकाय चुनावों में शिंदे सेना का प्रभाव बीजेपी के लिए चिंता का कारण बना है।
हाल ही में हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों में 288 निकायों में से सत्ताधारी गठबंधन महायुति ने 215 अध्यक्ष पदों पर कब्जा किया। नगर निकाय चुनाव में बीजेपी का स्ट्राइक रेट 63.1% था और एकनाथ शिंदे थोड़ा पीछे दिखे।
यूपी की सियासत में फिर लौटा ‘ब्राह्मण कार्ड’, शिवपाल के बयान ने मचाई सनसनी
निकाय चुनावों में एकनाथ शिंदे की शिवसेना का स्ट्राइक रेट 54.9% था, जो बीजेपी से थोड़ा कम था। और ये परिणाम महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों जैसे नहीं थे। वहीं, अजित पवार की पार्टी एनसीपी का स्ट्राइक रेट 44.3% आया है और ये आंकड़े दोनों नेताओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।


