“घंटा मंत्री” को हटाओ; कैलाश विजयवर्गीय के बिगड़े बोल पर भड़की कांग्रेस, मध्य प्रदेश से दिल्ली तक बवाल

विषय बेहद संवेदनशील था…। सवाल टेढ़ा नहीं सीधा-सपाट व सरल था…। जवाब मंत्रीजी को देना था…। सीधे सवाल का अटपटा जवाब देने की आदत से मजबूर मंत्रीजी ने एक बार फिर ऐसा कुछ बोल दिया कि सियासत में बवाल मच गया। मध्य प्रदेश से नई दिल्ली तक सियासी हलचल बढ़ गई। विरोधियों ने त्योरियां चढ़ा रखी हैं। विरोधी चाहते हैं कि ‘फोकट के मंत्री’ या ‘घंटा मंत्री’ को तत्काल उनके पद से चलता कर दिया जाए। मामला मध्य प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के उस विवादित बयान से जुड़ा है, जो उन्होंने आवेश में आकर दे दिया।

मध्य प्रदेश की भागीरथपुरी कॉलोनी में दूषित पेयजल के सेवन से दर्जनभर से अधिक नागरिकों की मौत के मामले ने मोहन यादव सरकार की परेशानी बढ़ा रखी है। नगर निगम की घोर लापरवाही की वजह से बड़ी आबादी को मलयुक्त पानी का सेवन करना पड़ा। नतीजन दो हजार से ज्यादा नागरिक अभी बीमार बताए जाते हैं।

हद दर्जे की लापरवाही उस क्षेत्र में बरती गई, जहां से मप्र सरकार के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय आते हैं। वह भाजपा के पुराने एवं वरिष्ठ नेताओं में शुमार हैं। दूषित पानी से नागरिकों की मौत के संबंध में एक पत्रकार ने जब मंत्रीजी से सवाल पूछा तो उन्होंने संवेदनशील विषय पर समझदारी दिखाने की बजाए एक तरह से नागरिकों की मौतों का मखौल उड़ाने का प्रयास किया। मंत्रीजी ने ‘फोकट का सवाल’ और ‘घंटा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर शर्मनाक जवाब दे डाला।

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सोशल मीडिया के दौर में उन्हें इस बात का शायद अंदाजा नहीं था कि उनका यह घटिया जवाब वायरल भी हो सकता है। जवाब वायरल होने पर उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया। डैमेज कंट्रोल की कोशिश में उन्होंने अपने बयान पर ‘सॉरी’ कहकर पल्ला झाड़ लिया। हालांकि ‘फोकट का सवाल’ और ‘घंटा’ जैसे शब्दों ने सोशल मीडिया के जरिए देशभर में नई बहस छेड़ दी। किसी जिम्मेदार जनप्रतिनिधि से इस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल करने की अपेक्षा नहीं की जाती है, मगर भारतीय राजनीति में सब कुछ संभव है।

दूषित पानी के सेवन से नागरिकों की मौत होने और मंत्रीजी के शर्मनाक बयान से मुश्किलों में घिरी सरकार ने कुछ लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई जरूर कर दी है, मगर एक पुराना सवाल फिर सामने है कि संवेदनशील मसले पर जनप्रतिनिधि क्यों अनपढ़ों जैसी भाषा का प्रयोग करते रहते हैं? वैसे मध्य प्रदेश में यह मामला अभी तक ठंडा नहीं पड़ा है। सरकार ने अब एक एसडीएम को सस्पेंड कर दिया है।

घंटा शब्द का जिक्र बना विवाद का कारण

कारण सरकारी दस्तावेज में ‘घंटा’ शब्द का जिक्र किया जाना है। भागीरथपुरी की घटना के विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन कर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा था। बाद में प्रशासन ने ज्ञापन की कॉपी कर सरकारी पत्रावली में भी ‘घंटा’ शब्द दर्ज करने की बड़ी गलती कर दी। नागरिकों को स्वच्छ वायु, स्वच्छ पेयजल व सुरक्षा उपलब्ध कराना प्रत्येक सरकार का दायित्व बनता है। कोई सरकार जब कर्तव्य पथ से विमुख होकर अपनी लापरवाही को स्वीकार नहीं करती है तो सियासत में ‘फोकट का सवाल’ और ‘घंटा’ जैसे शब्द गूंजने लगते हैं।

अच्छा होगा कि मप्र सरकार सूबे में स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था पर गंभीरता से ध्यान दे। जिन अधिकारियों पर जनता को शुद्ध पानी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, उन्हें जवाबदेह बनाया जाए ताकि भागीरथपुरी जैसी घटना की पुनरावृत्ति को रोका जा सके। जनप्रतिनिधियों को भी भाषा की मर्यादा का ख्याल रखने की जरूरत है। अन्यथा जिस जनता ने उन्हें सम्मानित ओहदे पर बैठाया है, वहीं जनता एक दिन उन्हें आसमान से जमीन पर उतार देगी।

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