यूपी चुनाव से पहले INDIA गठबंधन में सीटों पर नई बहस, कांग्रेस ने बढ़ाई सपा की टेंशन

Congress-SP Alliance 2026: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं मगर राजनीतिक हलचल तेज हो चुकी है। INDIA गठबंधन के भीतर अब सीटों के बंटवारे को लेकर चर्चा खुलकर सामने आने लगी है। कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि इस बार वह गठबंधन में पहले से बड़ी भूमिका चाहती है। इसी बीच नए प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के बयान ने राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दे दी है।
उनके बयान से साफ है कि कांग्रेस केवल गठबंधन में शामिल रहने तक सीमित नहीं रहना चाहती बल्कि बराबरी की हिस्सेदारी के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही बसपा प्रमुख मायावती की तारीफ और उन्हें साथ आने का संदेश भी राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया है।
बराबर सीटों की मांग ने बढ़ाई चर्चा
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि उनकी व्यक्तिगत इच्छा है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी गठबंधन में समान हिस्सेदारी के साथ चुनाव लड़ें। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की बातचीत के बाद ही होगा।
उन्होंने कहा कि उन्हें कोई आधिकारिक घोषणा करने का अधिकार नहीं है मगर कांग्रेस अपनी हिस्सेदारी को मजबूती से रखेगी और आधी सीटों की मांग करेगी।
403 सीटों का गणित क्या कहता है
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। अगर पुराने चुनावी रिकॉर्ड देखें तो करीब दस साल पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था। उस समय समाजवादी पार्टी ने 298 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे जबकि कांग्रेस 105 सीटों पर चुनाव मैदान में उतरी थी। कुछ सीटों पर दोनों दलों के बीच दोस्ताना मुकाबला भी हुआ था। आखिर में भाजपा की बड़ी जीत के बीच यह गठबंधन सफल नहीं हो सका।
इसके बाद लोकसभा चुनाव में दोनों दल फिर साथ आए। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में समाजवादी पार्टी ने 62 सीटों पर चुनाव लड़कर 37 सीटें जीतीं। वहीं कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6 सीटों पर जीत हासिल की।
कांग्रेस की बड़ी हिस्सेदारी की तैयारी
राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन से उत्साहित कांग्रेस विधानसभा चुनाव में करीब 150 सीटों की मांग कर सकती है। दूसरी ओर शुरुआती संकेत बताते हैं कि समाजवादी पार्टी कांग्रेस को लगभग 70 से 80 सीटों से ज्यादा देने के पक्ष में नहीं दिख रही है।
ऐसे में राजेंद्र पाल गौतम का बराबर हिस्सेदारी वाला बयान समाजवादी पार्टी पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि जब 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी सत्ता में थी तब भी कांग्रेस को 105 सीटें मिली थीं। इसलिए इस बार पार्टी अपने लिए पहले से बड़ा हिस्सा चाहती है।
कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि अखिलेश यादव मुख्यमंत्री पद की दौड़ में हैं। ऐसे में वह कांग्रेस को नाराज करने से बचना चाहेंगे। पार्टी का यह भी मानना है कि अगर कांग्रेस को मजबूत भूमिका मिलती है तो दलित और ब्राह्मण मतदाताओं का समर्थन गठबंधन को फायदा पहुंचा सकता है।
मायावती को लेकर भी दिया बड़ा संदेश
राजेंद्र पाल गौतम ने बसपा प्रमुख मायावती की भी खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि संविधान और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए बहुजन समाज के मुद्दों पर काम करने वाली सभी ताकतों को एक मंच पर आना चाहिए।
उन्होंने मायावती को समाज की बड़ी और प्रभावशाली नेता बताया और कहा कि कांग्रेस उनका सम्मान करती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह समझना कठिन है कि मौजूदा समय में उनकी राजनीतिक मजबूरियां क्या हैं।
दिलचस्प बात यह है कि पिछले महीने राजेंद्र पाल गौतम कुछ कांग्रेस नेताओं के साथ बिना पूर्व तय कार्यक्रम के लखनऊ स्थित मायावती के आवास पहुंचे थे। हालांकि उस समय दोनों नेताओं की मुलाकात नहीं हो सकी थी।
दलित वोट बैंक पर बढ़ा राजनीतिक फोकस
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में सांसद चंद्रशेखर आजाद का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में कांग्रेस ने दलित चेहरे के रूप में राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देकर नई रणनीति अपनाई है।
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विश्लेषकों के अनुसार कांग्रेस एक साथ दो लक्ष्य हासिल करना चाहती है। पहला बसपा के कमजोर पड़ते दलित वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करना। दूसरा चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देना।
इसी रणनीति के तहत कांग्रेस के कार्यक्रमों में अब मान्यवर कांशीराम की तस्वीरें भी पहले की तुलना में अधिक दिखाई देने लगी हैं।
आगे क्या हो सकता है
राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच अच्छे राजनीतिक संबंधों को देखते हुए माना जा रहा है कि अंत में सीट बंटवारे पर कोई सहमति बन सकती है। हालांकि नए प्रदेश प्रभारी के बयानों ने गठबंधन के भीतर नई बहस जरूर शुरू कर दी है।
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस केवल 2 सीटें जीत सकी थी जबकि समाजवादी पार्टी ने 111 सीटों पर जीत दर्ज की थी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि सीमित संगठनात्मक ताकत के बावजूद क्या कांग्रेस इस बार अपनी मांग के अनुसार बड़ा राजनीतिक हिस्सा हासिल कर पाएगी। आने वाले महीनों में यही उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।



