रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाने के लिए वैज्ञानिकों ने किसानों को किया जागरूक

मऊ। ICAR-NBAIM में 11 मई 2026 को “उर्वरकों के संतुलित उपयोग और मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पर राष्ट्रीय अभियान” विषय पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में वैज्ञानिकों ने किसानों से रासायनिक उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग और जैविक विकल्प अपनाने की अपील की।
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और आमजन को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग तथा सतत कृषि में सूक्ष्मजीवी इनोक्यूलेंट्स की भूमिका के प्रति जागरूक करना था। वैज्ञानिकों ने कहा कि लगातार रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता, जैविक कार्बन, सूक्ष्मजीव विविधता और जल धारण क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में कृषि को टिकाऊ बनाए रखने के लिए जैविक और सूक्ष्मजीवी आधारित तकनीकों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित निदेशक डॉ. आलोक कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ समाज और बेहतर कृषि उत्पादन की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि मिट्टी केवल उत्पादन का माध्यम नहीं बल्कि प्राकृतिक संसाधनों और जैव विविधता का महत्वपूर्ण आधार भी है। यदि मृदा स्वास्थ्य बिगड़ता है तो इसका सीधा असर किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।
कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं “मेरा गांव मेरा गौरव (MGMG)” टीम लीडर डॉ. वी. मागेश्वरन के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद एवं भारत सरकार किसानों तक वैज्ञानिक तकनीकों को पहुंचाने और संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए लगातार अभियान चला रही है। उन्होंने कहा कि सूक्ष्मजीवी इनोक्यूलेंट, जैव-संवर्धित खाद, हरी खाद और वर्मी कम्पोस्ट जैसे जैविक विकल्प न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारते हैं बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम करते हैं।
सम्मेलन के दौरान वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हिल्लोल चकदार ने संस्थान द्वारा विकसित सूक्ष्मजीवी इनोक्यूलेंट्स पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि “बायो-एनपीके”, “बायो-ग्रो”, “बायो-फॉस”, “बायो-जेडएन”, “बायो-केयर” और “बायो-फास्ट” जैसे जैविक उत्पाद किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहे हैं। इनके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता में 25 से 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। साथ ही ये उत्पाद मिट्टी की संरचना, जल धारण क्षमता और जैविक सक्रियता को भी बेहतर बनाते हैं।
डॉ. चकदार ने बताया कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र और ओडिशा सहित कई राज्यों के करीब 22 हजार किसानों को ब्यूरो द्वारा सूक्ष्मजीवी उत्पाद उपलब्ध कराए गए हैं, जिनसे किसानों को लाभ भी मिला है।
सम्मेलन में “मेरा गांव मेरा गौरव”, अनुसूचित जाति उप-योजना (SC-SP) और जनजातीय उप-योजना (TSP) जैसी योजनाओं के तहत किसानों को दिए जा रहे प्रशिक्षण, तकनीकी परामर्श और जागरूकता कार्यक्रमों की जानकारी भी साझा की गई। कार्यक्रम के अंत में प्रधान वैज्ञानिक डॉ. हर्ष वर्धन सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। वैज्ञानिकों ने कहा कि संतुलित उर्वरक उपयोग और जैविक तकनीकों को अपनाकर कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकता है।



