कब्र से कंकाल निकालने वाले वाकये के बाद अब यूपी में हुआ ये बड़ा कांड, देखकर चौंक जाएंगे आप!

ज्यादा दिन नहीं गुजरे जब ओडिशा में एक व्यक्ति ने नर कंकाल के साथ सरकारी बैंक में प्रवेश कर हड़कंप मचा दिया था। बाद में उस घटना की गूंज ओडिशा से नई दिल्ली तक सुनाई पड़ी थी। सोशल मीडिया पर भारत के सिस्टम को जमकर कोसा गया था। गरीब एवं बेबस व्यक्ति को सोशल मीडिया की जनता का साथ मिलने पर ओडिशा सरकार के अलावा स्थानीय प्रशासन और संबंधित बैंक का मैनेजमेंट भी एकाएक बैकफुट पर आ गया था। पीड़ित की हरसंभव मदद की गई। दरअसल पीड़ित जीतू मुंडा की बहन कलरा मुंडा की मौत हो गई थी।

पहले बैंक में नर कंकाल, अब पुलिस दफ्तर में कटा हाथ

कलरा का खाता ओडिशा ग्रामीण बैंक की ब्रांच में था। जीतू को मृत बहन के खाते से रकम निकालनी थी। बैंक द्वारा खाताधारक को साथ लाने की शर्त रख दिए जाने पर जीतू इस कदम गुस्से में आया कि वह मृत बहन की कब्र को खोदकर कंकाल लेकर सीधे बैंक पहुंच गया था। ओडिशा की उक्त घटना ने सरकारी सिस्टम पर गंभीर सवाल पैदा कर दिए थे। खैर वह मामला समय के साथ ठंडा पड़ चुका है। सिस्टम की लापरवाही का नया मामला उत्तर प्रदेश के कानपुर में प्रकाश में आया है। जहां आईटीबीपी का जवान अपनी मां का कटा हाथ लेकर जब पुलिस कमिश्नर से मिलने पहुंचा तो वहां अफरातफरी मच गई। कमिश्नर कार्यालय में मौजूद हर कोई हैरान रह गया।

आईटीबीपी जवान की पीड़ा पता चलने पर एक बार फिर सिस्टम को कोसने का सिलसिला शुरू हो गया है। दरअसल सांस लेने में दिक्कत होने पर जवान की मां को प्राइवेट हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया था। जहां उपचार के दौरान डॉक्टरों ने अचानक महिला मरीज का एक हाथ काट दिया। आरोप है कि इलाज में कोताही बरते जाने और शरीर में संक्रमण फैलने की वजह से डॉक्टरों को जब कुछ समझ नहीं आता तो उन्होंने महिला का हाथ काटने में देरी नहीं की। अस्पताल की लापरवाही से आहत आईटीबीपी जवान ने नजदीकी पुलिस स्टेशन में शिकायत की, मगर जगह-जगह भटकने के बाद भी पीड़ित की शिकायत पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई है।

नतीजन तंग आकर उसे पुलिस कमिश्नर से गुहार लगानी पड़ी। हालांकि पुलिस एक्शन में नजर आ रही है। वैसे इस घटनाक्रम ने पुलिस की बेरुखी को उजागर कर दिया है। समाज में शांति एवं कानून व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी पुलिस पर होती है। जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक, पुलिस चाहे कहीं की भी हो, फरियादियों के साथ उसका बर्ताव उम्मीदों के अनुरूप नहीं होता। प्रत्येक फरियादी को कभी चौकी तो कभी थाने स्तर से गुमराह कर बेवजह चक्कर कटवाए जाते हैं। परेशान होकर पीड़ित को पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों के सामने जाकर गुहार लगानी पड़ती है।

बैंक ने कहा “मुर्दे को लाओ तभी मिलेंगे पैसे”, मजबूर भाई बहन का कंकाल कंधे पर लादकर बैंक पहुँचा

इसके बाद भी तत्काल सुनवाई व कार्रवाई होने की कोई गारंटी नहीं होती। जनपद स्तर पर यदि पुलिस-प्रशासन के टॉप लेवल के अधिकारी के समक्ष निरंतर फरियादी पहुंचते हैं तो इससे समझना आसान है कि संबंधित विभाग में निचले स्तर पर जन शिकायतों के निस्तारण में कोताही बरती जा रही है। कल्पना कीजिए की जब केंद्रीय सुरक्षा बल से जुड़े एक जवान को कानपुर में एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस कमिश्नर कार्यालय में कटा हाथ लेकर पहुंचने पड़े तो जमीनी स्तर पर स्थिति कितनी खराब होगी। यूपी की कानून व्यवस्था को देशभर में सराहा जाता है, मगर पुलिस विभाग में आज भी बड़ी संख्या में ऐसे कारिंदे नियुक्त हैं, जिन्हें उच्चाधिकारियों के आदेश का रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता।

Related Articles

Back to top button