रेलवे प्लेटफॉर्म की बत्ती में पढ़ाई, कबाड़ बीनने वाली गोदावरी बनीं वकील; संघर्ष की दास्तान कर देगी भावुक

Godavari Devkate lawyer: किसी पक्की छत का सुख क्या होता है, यह गोदावरी देवकते को बचपन में मालूम तक नहीं था। उनकी शुरुआती जिंदगी का बड़ा हिस्सा गोदावरी नदी के तट पर खुले आसमान के नीचे और बाद का वक्त रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर बीता। मां के साथ भीख मांगकर और कबाड़ बीनकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने वाली गोदावरी ने कभी परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके। क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले के विचारों से प्रेरणा लेकर उन्होंने शिक्षा की राह चुनी और अब कानून की डिग्री हासिल कर वकील बन चुकी हैं। आज वे घरेलू हिंसा और शोषण की शिकार युवतियों के हक के लिए अदालत में आवाज बुलंद कर समाज और ‘जेन-जी’ के लिए मिसाल बन गई हैं।
संघर्ष ऐसा की करेंगे सलाम
शुरुआती दिनों में जब गोदावरी नदी में बाढ़ आई, तो एक संवेदनशील पुलिसकर्मी की सलाह पर उनका परिवार नासिक रोड रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर आ गया। यह जगह नदी किनारे से कुछ सुरक्षित तो थी, पर पेट भरने की चुनौती वैसी ही रही। कबाड़ बेचकर या भीख मांगकर जो मिलता, उससे काम चलता; कई बार रातें भूखे पेट भी कटीं। इसी बीच उनका दाखिला एक स्थानीय आंगनवाड़ी में करा दिया गया। मां शुरू में पढ़ाई-लिखाई के पक्ष में नहीं थीं, लेकिन शिक्षकों के समझाने पर कि 8वीं तक पढ़ने पर सरकारी छात्रवृत्ति और आर्थिक मदद मिलेगी, उनकी स्कूली शिक्षा का रास्ता खुला। गोदावरी ने दिन में छोटे-मोटे काम किए और रात को स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर जलने वाली पीली रोशनी के नीचे बैठकर कॉपियां खोलीं। सातवीं कक्षा में एक सहपाठी के घर ठिकाना मिला, पर वहां बिजली की व्यवस्था न होने के कारण पढ़ाई के लिए उन्हें वापस रेलवे स्टेशन ही आना पड़ता था।
छठी से दसवीं के दौरान उन्होंने शादियों में कैटरिंग और खाना परोसने का काम किया, जबकि मां बर्तन मांजने और कपड़े धोने का काम करती रहीं। इन विपरीत हालातों के बीच गोदावरी ने 10वीं कक्षा में 70.40 फीसदी अंक हासिल किए, जो उनके संघर्ष को देखते हुए किसी कीर्तिमान से कम नहीं थे।
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आर्थिक तंगी की वजह से महंगी साइंस स्ट्रीम छोड़ने को मजबूर हुईं और आर्ट्स चुना। उच्च शिक्षा के लिए उन्हें 65,000 रुपये की आर्थिक सहायता मिली थी, जिसे उन्होंने आगे की पढ़ाई और संघर्ष की याद के तौर पर संजोकर रखा। साल 2020 में कोविड लॉकडाउन के दौरान जब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी ठप हुई और रोजी-रोटी के लिए सब्जियां बेचनी पड़ीं, तब भी उन्होंने हौसला नहीं खोया और लॉ की डिग्री पूरी की। आज एडवोकेट गोदावरी जरूरतमंद महिलाओं को कानूनी न्याय दिलाने के मिशन में जुटी हैं।



