उम्र ढली, पर जोश नहीं; 80 पार के अन्ना की ये चाल बिगाड़ देगी महाराष्ट्र की राजनीति

वयोवृद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का जोश ठंडा नहीं पड़ा है। ढलती उम्र के बावजूद वह कर्तव्य पथ से पीछे नहीं हटे हैं। सत्ताधारियों की वादाखिलाफी के विरोध में उन्हें एक बार फिर आवाज उठानी पड़ी है। इसके चलते वह पुन: चर्चाओं में हैं। महाराष्ट्र में लोकायुक्त कानून लागू न होने से नाराज अन्ना हजारे ने तीस जनवरी से आमरण अनशन का ऐलान कर देवेंद्र फडणवीस सरकार में खलबली मचा दी है।

रालेगण सिद्धि में आमरण अनशन शुरू कर वह सरकार को जगाने की कोशिश करेंगे। लोकायुक्त कानून के समर्थन में उन्होंने तीन साल पहले भी अनशन किया था। उस वक्त केंद्रीय कृषि मंत्री और मुख्यमंत्री के आश्वासन पर उन्होंने अनशन समाप्त कर दिया था। हालांकि अब तक लोकायुक्त कानून लागू नहीं हो पाया है। ऐसे में अन्ना हजारे ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं।

हजारे की घोषणा ने महाराष्ट्र की सियासत में हलचल मचा दी है। देश में भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हैं। महाराष्ट्र भी इससे अछूता नहीं है। ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब भ्रष्टाचार से जुड़ी खबर सामने न आए। ऐश एवं समाज की प्रगति में भ्रष्टाचार को बड़ी रुकावट माना जाता है। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने में लोकायुक्त कानून महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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इस कानून को लागू न कर फडणवीस सरकार सवालों के घेरे में आ गई है। सवाल है कि क्या सरकार भ्रष्टाचारियों के दबाव में है? महाराष्ट्र में कुछ समय पहले डिप्टी सीएम अजित पवार के बेटे की लैंड डील से जुड़ा एक सनसनीखेज मामला सामने आया था। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा यह मामला जोर-शोर से उठाए जाने के बाद लैंड डील को आनन-फानन में निरस्त कर दिया गया था। वैसे महाराष्ट्र में जो काम विपक्ष को करना चाहिए, वह अन्ना हजारे कर रहे हैं। लोकायुक्त कानून लागू कराने के लिए विपक्ष को सरकार पर दबाव बनाना चाहिए।

अन्ना हजारे हैं आज जाना पहचाना नाम

विपक्ष की इस मामले में चुप्पी समझ से परे है। देश में अन्ना हजारे आज जाना पहचाना नाम हैं। कुछ साल पहले उन्होंने महाराष्ट्र से नई दिल्ली आकर भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोला था। उस समय देशभर में करप्शन विरोधी गजब का माहौल देखने को मिला था। शहर-शहर और गांव-गांव में हजारे के समर्थन में आम नागरिकों ने जागरूकता रैली निकाली थी। अन्ना के आंदोलन ने तत्कालीन यूपीए सरकार को संकट में डाल दिया था। अन्ना हजारे के आमरण अनशन पर समर्थन जाहिर करने के लिए कई नामचीन व्यक्ति पहुंचे थे।

अन्ना आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया जैसे व्यक्ति बाद में सियासी पारी आरंभ कर सफल भी हो गए थे। वाकई देश को अन्ना हजारे जैसे व्यक्तियों की आवश्यकता है। जिन्हें सिर्फ देश एवं समाज के कल्याण से मतलब है। राजनीति से कोसों दूर अन्ना कभी किसी विवाद में नहीं घिरते। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपना जीवन देश को समर्पित कर दिया है।

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साधारण जीवन गुजार कर वह आज के युवाओं को अहम संदेश देते हैं। वैसे अन्ना हजारे बनना आसान काम नहीं है। बगैर लोभ-लालसा के जनहित के लिए खुद को समर्पित करना बड़ी बात है। उधर, अन्ना हजारे के ऐलान के बाद महाराष्ट्र सरकार क्या कदम उठाती है, यह देखना दिलचस्प होगा। चूंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा हमेशा आवाज उठाने का दंभ भरती रही है। सरकार को अब कथनी-करनी में अंतर से परहेज करना होगा।

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