TMC के दोनों गुटों को मिला नया नाम और सिंबल: ममता को ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ तो बागी धड़े को ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न

TMC Symbol Frozen: पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आंतरिक घमासान के बीच भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। आयोग ने पार्टी के दोनों खेमों को अलग-अलग पहचान देते हुए नए नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए हैं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले आधिकारिक गुट को अब ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम दिया गया है और उन्हें ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ (Football Player) चुनाव चिह्न आवंटित हुआ है। वहीं, दूसरी ओर अरूप रॉय की अगुवाई वाले बागी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ के रूप में मान्यता देते हुए चुनाव चिह्न के तौर पर ‘लिफाफा’ (Envelope) थमा दिया गया है।

‘जोड़ा फूल’ फ्रीज होने के बाद नए सिंबल से लड़े जाएंगे उपचुनाव

इससे पहले चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को बड़ा झटका देते हुए पार्टी के मूल सिंबल को तुरंत प्रभाव से फ्रीज (जब्त) कर दिया था। इस सख्त कदम के बाद अब आगामी सभी विधानसभा उपचुनावों में दोनों धड़े अपनी-अपनी नई पहचान, नए पार्टी नाम और नए चुनाव चिह्नों के साथ चुनावी रण में उतरेंगे। आयोग की तरफ से तीन-तीन प्राथमिक विकल्प मांगे जाने के बाद दोनों गुटों की ओर से दी गई प्राथमिकताओं के आधार पर यह अंतिम आवंटन तय किया गया है। आयोग ने गुरुवार को ही ममता खेमे और विधायक ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले विद्रोही गुट दोनों पर टीएमसी के मूल नाम व निशान के प्रयोग पर पाबंदी लगा दी थी।

चुनाव आयोग का अंतरिम आदेश और कानूनी आधार

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और आयोग की बेंच ने ममता बनर्जी तथा अरूप रॉय गुट के प्रतिनिधियों की दलीलें सुनने के बाद गुरुवार देर रात अंतरिम आदेश जारी किया। आयोग ने स्पष्ट किया कि ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968’ के कानूनी प्रावधानों के तहत इस विवाद में दीर्घकालिक और ठोस फैसला लिया जाना बाकी है। आयोग ने साफ निर्देश दिया कि जब तक विवाद का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, तब तक कोई भी पक्ष मूल तृणमूल कांग्रेस के नाम या पार्टी के अधिकृत व आरक्षित ‘जोड़ा फूल’ (घास और दो फूल) सिंबल का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा।

1998 से पहचान रहे ‘जोड़ा फूल’ का छिनना ममता के लिए बड़ा झटका

हाथ से उकेरे गए ‘जोड़ा फूल’ का छिन जाना ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर के लिए बेहद भावुक और रणनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि 1998 में पार्टी की स्थापना के बाद से ही यह निशान राज्यभर में टीएमसी की सबसे बड़ी पहचान रहा है। मई महीने में हुए विधानसभा चुनाव के प्रतिकूल नतीजों के बाद से ही टीएमसी के भीतर विद्रोह की चिंगारी सुलग रही थी, जहां पार्टी के दो-तिहाई से अधिक विधायक बगावती तेवर अख्तियार कर चुके थे। यह आंतरिक बगावत जल्द ही विधानसभा से निकलकर संसद के गलियारों तक जा पहुंची। जून में 58 बागी विधायकों ने ममता बनर्जी के वफादार प्रत्याशी सोवनदेब चट्टोपाध्याय को दरकिनार करते हुए पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया और विधानसभा अध्यक्ष से इस पद की विधिवत मान्यता भी हासिल कर ली थी।

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सांसदों की टूट और एनडीए को समर्थन से बढ़ीं मुश्किलें

विधायकों के विद्रोह के महज पांच दिन बाद ही पार्टी को संसदीय स्तर पर भी तगड़ा आघात लगा, जब टीएमसी की वरिष्ठ नेता रहीं काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 20 लोकसभा सांसदों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। इन सभी सांसदों ने ‘नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) नाम के एक गुमनाम दल का दामन थाम लिया और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) गठबंधन को बाहर से समर्थन देने का औपचारिक ऐलान कर दिया। सांसदों और विधायकों के इस बड़े पलायन ने टीएमसी के संगठनात्मक ढांचे को हिलाकर रख दिया, जिसका नतीजा अब पार्टी के नाम और ऐतिहासिक चुनाव चिह्न के बंटवारे के रूप में सामने आया है।

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