यूजीसी की नई गाइडलाइन: क्या सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए यह बुरा सपना साबित होगा

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नई गाइड लाइन पर उभरा विवाद निरंतर बढ़ रहा है। यह विवाद सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। देश के विभिन्न राज्यों में विरोध की आंधी चल पड़ी है। सवर्ण समाज में जबरदस्त नाराजगी है। उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों में आक्रोश और डर दोनों उत्पन्न होना स्वाभाविक बात है।
यूजीसी की नई गाइड लाइन के तहत कॉलेज कैंपस में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा पिछड़ी जातियों के छात्र-छात्राओं को भी विशेषाधिकार का लाभ मिल सकेगा। यदि एससी/एसटी या ओबीसी वर्ग का कोई छात्र सामान्य वर्ग के सहपाठी के खिलाफ शिकायत करता है तो तत्काल सुनवाई कर कार्रवाई की जाएगी। जांच में शिकायत झूठी मिलने पर शिकायत कर्ता पर कोई एक्शन नहीं होगा। जबकि पहले झूठी शिकायत करने पर जुर्माने का प्रावधान था। इस प्रावधान को खत्म कर दिया गया है।
नई गाइड लाइन से किसको होगी दिक्कत
इसके अतिरिक्त जांच कमेटी में सामान्य वर्ग का कोई सदस्य भी नहीं रहेगा। देखा जाए तो यूजीसी की नई गाइड लाइन भविष्य में सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के उत्पीड़न को बढ़ावा देगी। सबसे ज्यादा असर इस श्रेणी के उन छात्र-छात्राओं पर पड़ेगा, जो पढ़ने में होशियार हैं। उन्हें हमेशा यह डर बना रहेगा कि दूसरी श्रेणी का कोई सहपाठी रंजिश में फेक कंप्लेन न कर दे।
उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में यूजीसी की मुखालफत तेज हो गई है। नई गाइड लाइन को मंजूरी देने से पहले सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों की चिंता, डर एवं करियर की अनदेखी किए जाने दुर्भाग्यपूर्ण है। ब्राह्मण, वैश्य, त्यागी, खत्री आदि समाज ने यूजीसी के फैसले पर सवाल उठाए हैं। यूपी में राजा भैया और बृजभूषण शरण सिंह जैसे कद्दावर नेता भी इस मामले में खुलकर विरोध दर्ज करा चुके हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी/एसटी और ओबीसी वर्ग को पहले से आरक्षण का लाभ मिल रहा है।
समस्या कहां आती है
प्रतियोगी परीक्षा में इन वर्गों के छात्रों से अधिक नंबर मिलने के बावजूद सामान्य वर्ग के प्रतिभागी को आसानी से दाखिला नहीं मिल पाता है। कॉलेजों में प्रवेश के लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे में यूजीसी की नई गाइड लाइन और अधिक परेशानी बढ़ाने वाली साबित हो रही हैं। आक्रोशित स्वर्ण समाज के निशाने पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी आ गए हैं। वर्तमान में वह शिक्षा, महिला, बाल और युवा मामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन हैं।
दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति की समीक्षा के उपरांत यूजीसी ने नए बदलावों को अनुमति प्रदान की है। इस प्रकरण में केंद्र सरकार की तरफ से फिलहाल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। नई गाइड लाइन से विवादास्पद बिंदु न हटाए जाने पर केंद्र एवं राज्य सरकारों को भी सवर्ण समाज की नाराजगी मोल लेनी पड़ सकती है। यूजीसी की स्थापना 71 साल पहले की गई थी।
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यूजीसी पर विश्वविद्यालय शिक्षा को बढ़ावा देने, समन्वय करने तथा विश्वविद्यालयों में शिक्षण, परीक्षा एवं अनुसंधान के मानकों को निर्धारित और बनाए रखने तथा इस अधिनियम के तहत अपने कार्यों के निष्पादन की जिम्मेदारी है। विश्वविद्यालयों को मान्यता देना, अनुदान वितरित करना तथा शोध को बढ़ावा देना जैसे काम भी यूजीसी के जिम्मे हैं। यह भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के अधीन एक वैधानिक निकाय है। उसके फैसलों पर पूर्व में भी सवाल उठते रहे हैं।



