दशलक्षण महापर्व शुरू, जानिए कौन मनाता है और क्या है इसकी खास बातें
मुनिश्री भाव सागर के सानिध्य में अभिषेक- शांतिधारा बाद उत्तम क्षमा धर्म की पूजा हुई सम्पन्न

जसवंतनगर,इटावा। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में बुधवार को मुनिश्री 108 भाव सागर महाराज के सानिध्य में दशलक्षण महापर्व का भव्य शुभारंभ हुआ। सुबह बच्चों ने मंगल प्रभात फेरी निकाली। इसमें बच्चों ने जैन भजनों और वीर रस से ओतप्रोत गीतों का गायन किया। ‘आओ वीरों अमर समर में’ जैसे भजनों से वातावरण भक्तिमय हो गया। प्रभात फेरी नगर के प्रमुख मार्गों से होकर मंदिर परिसर पहुंची।
इसके बाद श्री पार्श्वनाथ भगवान का दिव्य अभिषेक किया गया। नवीन पंडाल में दशलक्षण महापर्व के विधान की धार्मिक गतिविधियां शुरू हुईं। प्रथम दिन श्री शीतलनाथ भगवान का अभिषेक और शांतिधारा संपन्न हुई। शांतिधारा का सौभाग्य सौधर्म इंद्र राजकमल चिराग जैन परिवार को मिला। मुनिश्री भाव सागर महाराज के मुखारविंद से शांतिधारा कराई गई। श्रद्धालुओं ने नगर, समाज और सभी जीवों के कल्याण की मंगल कामना की।
महाविधान में महिलाओं ने मंगल कलश स्थापित किए। प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म की पूजा-अर्चना विधि-विधान से हुई। मुनिश्री ने कहा कि क्षमा जैन धर्म का महत्वपूर्ण गुण है। क्रोध और वैरभाव का त्याग कर सभी जीवों के प्रति क्षमा व मैत्री का भाव रखना चाहिए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
दशलक्षण महापर्व जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पर्व है। इसे आत्मशुद्धि, संयम और सदाचार का पर्व माना जाता है। यह पर्व 10 दिनों तक मनाया जाता है और प्रत्येक दिन एक विशेष धर्म-गुण को जीवन में अपनाने पर जोर दिया जाता है।
दशलक्षण महापर्व के 10 धर्म
उत्तम क्षमा — सभी के प्रति क्षमा और मैत्री का भाव रखना।
उत्तम मार्दव — अहंकार और घमंड का त्याग करना।
उत्तम आर्जव — मन, वचन और कर्म में सरलता रखना।
उत्तम शौच — लोभ आदि आंतरिक विकारों से मुक्ति और मन की शुद्धता।
उत्तम सत्य — सत्य बोलना और सत्य का आचरण करना।
उत्तम संयम — इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना।
उत्तम तप — आत्मसंयम, उपवास और साधना के माध्यम से आत्मशुद्धि।
उत्तम त्याग — आसक्ति और परिग्रह का त्याग करना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना।
उत्तम आकिंचन्य — ममत्व और सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति कम करना।
उत्तम ब्रह्मचर्य — विचार, वचन और कर्म में पवित्रता एवं आत्मसंयम रखना।
क्या है इसकी खासियत?
दशलक्षण महापर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के आचरण और आत्मचिंतन पर केंद्रित है। इन दस दिनों में श्रद्धालु पूजा-पाठ, स्वाध्याय, ध्यान, उपवास और संयम जैसे साधनों के जरिए अपने भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों को कम करने का प्रयास करते हैं।
इस पर्व के दौरान क्षमा और आत्मावलोकन को विशेष महत्व मिलता है। जैन परंपरा में पर्व के समापन के अवसर पर क्षमावाणी/क्षमा पर्व के माध्यम से एक-दूसरे से क्षमा मांगने और मन में किसी के प्रति द्वेष न रखने का संदेश दिया जाता है।



