ईरान की ‘दादागिरी’ या अमेरिका की ‘जल्दबाजी’, जानें क्यों विफल हुई साल की सबसे बड़ी शांति वार्ता

Israel-Iran war LIVE updates: आखिर वही हुआ, जिसका डर था। इस्लामाबाद वार्ता विफल होने से समूची दुनिया के समक्ष नई चिंता पैदा हो गई है। अमेरिका और ईरान के शीर्ष प्रतिनिधि स्वदेश लौट चुके हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाकर वार्ता की विफलता के कारण गिना रहे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर के सपने टूट चुके हैं।
शहबाज-मुनीर के अरमानों पर फिरा पानी
इस्लामाबाद वार्ता के जरिए दोनों ने पाकिस्तान की छवि को बदलने की भरपूर कोशिश की, मगर उन्हें सकारात्मक रिजल्ट नहीं मिल पाए। शहबाज और मुनीर को अब घर के भीतर भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। वार्ता की विफलता के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस प्रकार के तेवर दिखाने आरंभ कर दिए हैं, उससे साफ है कि मिडिल ईस्ट में शांति का दौरान पुन: खत्म होने के कगार पर है।
होर्मुज की घेराबंदी और कच्चे तेल की आग
मुख्य समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट पर ईरानी की दादागिरी कायम है। ईरान ने होर्मुज को खोलने से साफ इंकार कर दिया है। यानी वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट दूर होने की संभावना धूमिल पड़ गई हैं। कच्चे तेल के दामों में और उछाल आना तय है। होर्मुज स्ट्रेट और यूरेनियम संवर्द्धन की अमेरिका की मांग को खारिज कर तेहरान ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है। ऐसे में तनाव और बढ़ने के आसार बढ़ गए हैं।
इजराइल जहां निर्णायक सैन्य बढ़त को बनाए रखना चाहता है, वहीं अमेरिका व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक दबावों को ध्यान में रखकर संयम दिखाना चाहता है। नतीजन लेबनान और गाजा जैसे मोर्चों पर जारी तनाव ने शांति प्रयासों को कमजोर किया है। होर्मुज का सवाल वार्ता की धुरी रहा। यदि ईरान नियंत्रण रखकर टोल या शर्तें लागू करता है, तो यह वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री कानून दोनों के लिए चुनौती होगी।
अमेरिका के लिए इसे स्वीकार करना कठिन है, मगर पूर्ण सैन्य टकराव से बचने के लिए कोई ‘मध्य मार्ग’, जैसे अंतरराष्ट्रीय निगरानी खोजा जा सकता है। पाकिस्तान की मध्यस्थता पर भी सवाल उठे हैं। एक तरफ वह इस्लामाबाद को कूटनीतिक केंद्र बनाने की कोशिश करता रहा , दूसरी ओर उसकी आंतरिक राजनीति में इसका विरोध इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। यदि मध्यस्थ पर ही संदेह हो, तो वार्ता की सफलता स्वतः सीमित हो जाती है। अमेरिका की घरेलू राजनीति भी इस समीकरण में अहम है।
डोनाल्ड ट्रंप पर गिरती लोकप्रियता और महाभियोग की आशंका उन्हें आक्रामक बयानबाजी और त्वरित ‘जीत’ की तलाश की तरफ धकेल सकती हैं, मगर यही जल्दबाजी किसी स्थायी समाधान के मार्ग में बाधा भी बन सकती है।
बारूद के ढेर पर बैठा मिडिल ईस्ट
वार्ता विफल होने से क्षेत्र में फिर से तीव्र संघर्ष उत्पन्न होने की संभावना बढ़ चुकी है। होर्मुज में अस्थिरता बढ़ने और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव आना तय है। ऐसी स्थिति में एक संतुलित, विश्वसनीय और तटस्थ शक्ति की जरूरत है, जहां भारत की भूमिका उभर सकती है। भारत के दोनों पक्षों से संवाद और क्षेत्र में उसके हित उसे संभावित मध्यस्थ बना सकते हैं।
अगर पाकिस्तान में ईरान-अमेरिका बातचीत फेल हो जाती है, तो ट्रंप का अगला प्लान क्या होगा?
इस्लामाबाद वार्ता से चमत्कार की उम्मीद करना बेमानी था। यह अधिक से अधिक ‘तनाव प्रबंधन’ का मंच बन सकती थी, न कि स्थायी समाधान का। अमेरिका-ईरान में जुबानी जंग एकाएक बढ़ गई है। लेबनान के खिलाफ इजरायल की आक्रामकता जारी है। तुर्की व इजरायल में भी तनातनी सामने आई है। मिडिल ईस्ट में पुन: जंगी जहाजों की गूंज, ड्रोन अटैक, मिसाइल हमले जैसी स्थिति सामने आ सकती है।



