इकलौते शहीद बेटे को पिता ने दी मुखाग्नि सभी ऑंखे हुई नम
तीन दिन पहले घर से गए थे, जम्मू में सर्च ऑपरेशन के बीच लगी थी गोली

सुल्तानपुर।अलीगंज बाजार से जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा की बर्फीली वादियों में देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले वीर सपूत अखिलेश शुक्ला जब तिरंगे में लिपटकर अपने गांव मझना पूरे वैसी का पुरवा पहुंचे, तो पूरा इलाका शोक में डूब गया। जिस आंगन में कभी हंसी गूंजती थी, आज वहां मातम पसरा था।
जैसे ही शहीद का पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, जनसैलाब उमड़ पड़ा। “भारत माता की जय” और “अखिलेश शुक्ला अमर रहें” के गगनभेदी नारों से आसमान गूंज उठा। हर आंख नम थी और हर दिल गर्व व दुख के भाव से भरा हुआ था।
बताया जाता है कि अखिलेश शुक्ला EME Regiment में नायक के पद पर तेहगांव में तैनात थे। 28 मार्च की रात करीब 9 बजे सर्च ऑपरेशन के दौरान उन्हें गोली लग गई। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्हें दिल्ली के RR Hospital में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान रात 12 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
अखिलेश शुक्ला ऐसे परिवार से आते थे, जहां देशभक्ति की परंपरा पहले से ही रही है। उनके पिता भारतीय सेना से रिटायर्ड हैं, और परिवार में दो बहनों के बीच वह अकेले भाई थे। उनके शहीद होने से न सिर्फ परिवार, बल्कि पूरे क्षेत्र को अपूरणीय क्षति हुई है।
अंतिम विदाई के दौरान सेना के जवानों ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ अपने वीर साथी को सलामी दी। बंदूकों की गूंज और बिगुल की धुन के बीच जब अंतिम संस्कार हुआ, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं।मां की चीखें, पिता की खामोशी और परिजनों का बिखरता साहस शहीद अखिलेश शुक्ला भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका साहस, उनका बलिदान और उनकी देशभक्ति हमेशा अमर रहेगी। वह सिर्फ अपने परिवार का नहीं, बल्कि पूरे देश का बेटा था—जो अब हमेशा के लिए अमर शहीद हो गया।



