हिंदू वोटर्स का ‘गेम चेंजर’ फैसला! BNP को समर्थन या कट्टरवाद का डर, किस तरफ झुकेगा पलड़ा

पिछले डेढ़ साल से अशांत बांग्लादेश में आम चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो गई है। नई सरकार के गठन के लिए बारह फरवरी को मतदान होना है। चुनाव के ऐन मौके पर सियासी हिंसा भड़कने से चिंता पैदा होना स्वाभाविक है।

चुनाव मैदान में बांग्लादेश नेशलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी आमने-सामने हैं। बीएनपी की कमान देश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे ने संभाल रखी है। खालिदा जिया के आकस्मिक निधन के बाद उनके बेटे ने स्वदेश लौटकर सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना है। बीएनपी की तरफ से वह पीएम पद के उम्मीदवार भी है। जबकि जमात-ए-इस्लामी को ग्यारह संगठनों का समर्थन हासिल है।

यूनुस ने अवामी लीग पर लगा रखा है प्रतिबंध

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को चुनाव मैदान से बाहर रहना पड़ा है। दरअसल बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा रखा है। तख्तापलट के बाद से शेख हसीना भारत में शरण लिए हैं। सत्ता की लड़ाई ने बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी को एक-दूसरे का ऐसा प्रतिद्वंदी बना दिया है कि दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता अब हिंसा पर उतर आए हैं। इससे शांति एवं कानून व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ा है। आम मतदाताओं में डर एवं चिंता का माहौल है।

आम चुनाव निष्पक्ष, पारदर्शी एवं शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न होने की संभावना दिखाई नहीं दे रही है। हालांकि बांग्लादेश के बेहतर भविष्य के लिए मजबूत एवं तटस्थ सरकार का सत्ता में आना जरूरी माना जा रहा है। देश में एक करोड़ से ज्यादा हिंदू रहते हैं। चुनाव को लेकर हिंदू मतदाता असमंजस की स्थिति में है। इन मतदाताओं को समर्थन बीएनपी को मिलने की उम्मीद है।

वैसे हिंदू वोटरों को यह भी डर है कि यदि वह बीएनपी का सपोर्ट करते हैं तो भविष्य में जमात-ए-इस्लामी व उसके समर्थक संगठनों के कट्टरवादी तत्व उन्हें निशाना बना सकते हैं। शेख हसीना के पंद्रह साल के शासन में बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठनों पर शिकंजा कसा रहा था। उस दौर में अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की वैसी चिंता नहीं थी, जैसी आज नजर आती है। हसीना सरकार ने कट्टर मानसिकता के नेताओं और व्यक्तियों को जेल में रखकर देश में अमन-चैन कायम रखने में सफलता प्राप्त की थी।

ऐसे और खराब हो सकते हैं बांग्लादेश के हालात

यदि जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व का गठबंधन सत्ता में आने में सफल होता है तो निश्चित रूप से बांग्लादेश के हालात और अधिक खराब हो जाएंगे। खासकर हिंदू समुदाय की सुरक्षा पहले से ज्यादा खतरे में होगी। अल्पसंख्यकों को बीएनपी की सत्ता आने पर राहत मिलने के आसान नजर आ रहे हैं। आम चुनाव के बाद बांग्लादेश और भारत के रिश्ते सुधरेंगे या और खराब होंगे, यह तस्वीर भी साफ हो जाएगी। सत्ता में बीएनपी की वापसी होने पर दोनों देशों के संबंधों में सुधार आने की संभावना बन सकती है।

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चूंकि बीएनपी चीफ और नए पीएम के सामने चुनौतियां कम नहीं होंगी। देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना, मुल्क में शांति की स्थापना करना, उद्योगों के अनुकूल माहौल पैदा करना, पड़ोसी मुल्कों से रिश्तों को सुधारना, बढ़ती बेरोजगारी व महंगाई को काबू में करना जैसे मोर्चों पर नई सरकार को काफी कसरत करनी होगी। इसके उलट यदि जमात-ए-इस्लामी को सरकार बनाने का अवसर मिलता है तो बांग्लादेश की हालत पाकिस्तान से भी बदतर होने से रोकना संभव नहीं होगा। चूंकि कट्टरपंथी मानसिकता के नेताओं को मनमानी करने की खुली छूट मिल जाएगी। वैसे भी पाकिस्तान लंबे समय से बांग्लादेश में अपनी स्थिति मजबूत करने में लगा है।

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