जब डिप्टी सीएम से टकराई महिला अधिकारी, महाराष्ट्र की सियासी ड्रामा की नई कहानी

महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार और आईपीएस अंजना कृष्णा के बीच उभरा विवाद सरकारी और सियासी गलियारों में चर्चाओं का विषय बन गया है। महिला अधिकारी को अपना फर्ज निभाने से रोकने पर डिप्टी सीएम विपक्ष के निशाने पर हैं। किरकिरी होने पर उन्हें बैकफुट पर आना पड़ा है।
महाराष्ट्र की सियासत में अजित पवार जाना-पहचाना नाम हैं। वह पांचवीं बार डिप्टी सीएम पद की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्हें राजनीति की अच्छी समझ है। आईपीएस और आईएएस अधिकारियों संग काम करने का उन्हें काफी अनुभव है। जिस स्तर का सियासी पद एवं कद पवार का है, ऐसे नेता से इस प्रकार के आचरण की उम्मीद नहीं की जाती, जैसा उन्होंने महिला पुलिस अधिकारी के साथ किया है। अंजना कृष्णा शिकायत मिलने पर अवैध खनन की जांच करने पहुंची थीं।
प्रारंभिक जांच में शिकायत सही पाए जाने पर उन्होंने काम को बंद कराने का प्रयास किया। इस बीच मौके पर मौजूद एनसीपी नेता ने सीधे डिप्टी सीएम अजित पवार को कॉल कर आईपीएस अंजना को फोन थमा दिया था। यदि फोन पर कोई व्यक्ति खुद को डिप्टी सीएम बताकर अनैतिक कार्य रोकने का फरमान दे तो कोई भी कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी वही करेगा, जैसा अंजना कृष्णा ने किया। दूसरे के फोन पर आई कॉल से कोई अधिकारी कैसे यकीन कर लेगा कि कॉलर डिप्टी सीएम बोल रहे हैं।
ऐसे में आईपीएस अंजना का यह जवाब की ‘कैसे मान लूं, आप डिप्टी सीएम हैं’, कोई गलत बात नहीं है। जालसाज भी अक्सर फोन कर अधिकारियों पर अनावश्यक दबाव बनाते रहते हैं। एनसीपी को इस मामले को बेवजह तूल नहीं देना चाहिए। अच्छा यह होता कि डिप्टी सीएम को मामले की सच्चाई जाने बगैर फोन पर सीधे आदेश नहीं देने चाहिए थे।
वह पुलिस के उच्चाधिकारियों से बात कर सकते थे। वैसे देश में ईमानदार एवं निडर महिला अधिकारियों ने समय-समय पर ऐसी मिसाल पेश की हैं, जो लंबे समय तक याद रखने लायक हैं। देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी का इंदिरा गांधी के साथ विवाद भूला नहीं जा सकता।
आयरन लेडी के नाम से लोकप्रिय इंदिरा गांधी जिस वक्त प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी निभा रही थीं तब किरन बेदी ने यातायात नियमों का उल्लंघन होने पर उनकी गाड़ी का चालान कर दिया था। उस दौर में किरण के साहस की देश-विदेश में खूब चर्चाएं हुई थीं। उत्तर प्रदेश में तत्कालीन सपा सरकार के दौरान गौतमबुद्ध नगर जिले में एक अवैध निर्माण को बंद कराने पर एक महिला अधिकारी को दंडित होना पड़ा था।
अधिकारी के कृत्य से नाराज होकर अखिलेश यादव की सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया था। सोशल मीडिया पर अधिकारी के समर्थन में मुहिम चलाई गई थी। विपक्ष ने भी सरकार की जमकर आलोचना की थी, मगर अधिकारी को काफी समय तक परेशानी झेलनी पड़ी थी। असल में समाज को ऐसे अधिकारियों की जरूरत है, जो किसी प्रकार के राजनीतिक दबाव में न आकर ईमानदारी पूर्वक काम करते रहें। बदलते समय के साथ युवा अधिकारियों की सोच भी बदल रही है।
इसका उदाहरण अंजना कृष्णा को देखकर मिलता है। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के मध्य विवाद होना कोई नई बात नहीं है, मगर अपनी गलत को स्वीकार कर लेने से प्रतिष्ठा धूमिल नहीं होती। बल्कि नागरिकों की नजर में सम्मान और बढ़ जाता है। अजित पवार को भी इस बारे में अवश्य सोचना चाहिए।



