फैमिली मैन 3: लौटा श्रीकांत तिवारी, लेकिन इस बार ‘वो’ मज़ा क्यों नहीं

फैमिली मैन 3: लंबे इंतज़ार के बाद मनोज बाजपेयी वाला श्रीकांत तिवारी फिर लौटा है। दो शानदार सीज़न के बाद तीसरे सीज़न से उम्मीदें आसमान छू रही थीं। हर कोई यही पूछ रहा था कि क्या इस बार भी दिल थामकर बैठना पड़ेगा या फिर कुछ नया ट्विस्ट मिलेगा। अब सीरीज़ पूरी रिलीज़ हो चुकी है तो सच पता चल ही गया। चलिए बिना कुछ ज़्यादा स्पॉइल किए बताते हैं कि असल में माजरा क्या है।

कहानी अब कहां पहुंची

श्रीकांत और सुचित्रा की शादी में दरार साफ़ दिख रही है। बच्चे बड़े हो चुके हैं। धृति अब कॉलेज में आंदोलनों की अगुवाई कर रही है तो अथर्व हाई स्कूल में मस्ती मार रहा है। पुरानी साथी ज़ोया भी ज़ख़्मों से उबरकर मैदान में वापस आ गई है।

इस बार मिशन उत्तर-पूर्व का है। प्रधानमंत्री मणिपुर और नागालैंड में शांति बहाल करना चाहते हैं। श्रीकांत और उनका बॉस कुलकर्णी वहाँ शांति समझौते के लिए भेजे जाते हैं। लेकिन पहुँचते ही एक स्थानीय ड्रग लॉर्ड रुकमा उन पर जानलेवा हमला बोल देता है।

फिर खेल पलटता है। टास्क के बड़े अफ़सरों को लगता है कि हमले के पीछे खुद श्रीकांत का हाथ है। अरेस्ट वारंट निकलते ही श्रीकांत परिवार समेत मुंबई की तरफ़ भागता है। अब सवाल ये है कि वो अपने ऊपर लगा कलंक कैसे धोएगा और असली दुश्मन कौन है। जवाब तो देखकर ही पता चलेंगे लेकिन रास्ता थोड़ा उबाऊ ज़रूर लगता है।

वो पुरानी रफ़्तार कहाँ खो गई?

पहले दो सीज़न में हर एपिसोड के साथ सीटी बजती थी। इस बार पहले एपिसोड को छोड़ दें तो बाकी कड़ियों में बस भागमभाग है। कोई एक देश से दूसरे देश छिप रहा है तो कोई किसी का पीछा कर रहा है। एक्शन कम है और कन्फ्यूजन ज़्यादा।

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श्रीकांत तिवारी जो पहले हर सिचुएशन का मालिक लगता था इस बार खुद हैरान-परेशान सा दिखता है। विलेन रुकमा के साथ उसका आमना-सामना सिर्फ़ आखिरी कुछ मिनटों में होता है और वो भी फीका पड़ जाता है। राज और डीके का डायरेक्शन इस बार पहले जैसा तड़का नहीं लगा पाया। हाँ जब श्रीकांत और जेके साथ होते हैं या बच्चों के साथ घरेलू सीन आते हैं तो मुस्कान अपने आप आ जाती है। लेकिन वो दिल दहला देने वाले मोमेंट और ज़ोरदार एक्शन सीन बुरी तरह मिस हैं।

एक्टिंग ने फिर भी बाँधकर रखा

यहाँ कोई शिकायत नहीं। मनोज बाजपेयी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि श्रीकांत तिवारी का रोल उनके लिए बनाया गया है। परिवार और देश के बीच फँसे इंसान की बेबसी को वो आँखों से बयाँ कर जाते हैं।

जयदीप अहलावत रुकमा बने हैं लेकिन लेखन ने उनका साथ नहीं दिया। उनका किरदार जितना ख़तरनाक दिखना चाहिए था उतना ख़तरनाक बन नहीं पाया। शारिब हाशमी फिर वही पुराना जादू बिखेरते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग सीरीज़ की जान है। प्रियामणि, अश्लेषा ठाकुर और बाकी कलाकार भी अपने हिस्से का अच्छा काम करते हैं। एक ख़ास किरदार की सरप्राइज़ एंट्री भी है जो अच्छा लगता है।

आख़िर में बात वही पुरानी

सीधा-सादा बोलें तो ‘द फैमिली मैन 3’ पहले दो सीज़न की ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाएगी। कहानी बीच में लटक जाती है। क्लाइमेक्स भी वो दम नहीं जिसका इंतज़ार था। इतने शानदार कलाकार होने के बावजूद सीरीज़ उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती।

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