विधायक थे तो क्या हुआ; लोक सेवक की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर को घेरा, रिहाई का रास्ता पूरी तरह बंद

उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने उन्नाव बलात्कार मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को निचली अदालत द्वारा दी गई उम्रभर की सजा को स्थगित करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी है। इस निर्णय ने पूरे देश में कानून और न्याय प्रणाली को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर सवाल

उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि यह आदेश ठीक नहीं है, क्योंकि इस मामले में आरोपित ने न केवल एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया था, बल्कि आरोपी की नीयत और कृत्य भी समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। सेंगर को सजा देने के बाद अदालत में एक नया सवाल उठाया गया था कि क्या कानून में कुछ बदलावों के कारण अब इस मामले को अलग तरीके से देखा जाना चाहिए।

केंद्रीय जांच ब्यूरो की आपत्ति

सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उच्च न्यायालय ने सेंगर की सजा को इस आधार पर स्थगित किया था कि उसने सात साल से अधिक सजा काट ली थी, मगर यह तर्क बिल्कुल गलत है। उन्होंने बलात्कार कानून में किए गए संशोधनों का हवाला देते हुए कहा कि इस समय न्यूनतम सजा 20 साल है। कोर्ट ने तुषार मेहता की बात पर ध्यान दिया और कहा कि यह संशोधन बाद में आया था, मगर सेंगर की कृत्य की गंभीरता को देखते हुए उसे हल्के सजा से बचाया नहीं जा सकता।

लोकसेवक की परिभाषा पर विवाद

सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण बिंदु सामने आया, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने यह सवाल उठाया कि क्या सेंगर को लोकसेवक माना जा सकता है। यदि एक कांस्टेबल इस श्रेणी में आता है, तो क्या एक विधायक को इस से बाहर रखा जा सकता है? अदालत ने कहा कि यह स्थिति और भी पेचीदा हो सकती है क्योंकि यदि लोक सेवक के रूप में विधायक को बाहर कर दिया गया तो इससे कई मामलों में असमंजस पैदा हो सकता है।

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सेंगर के खिलाफ कोर्ट के कई फैसले

सेंगर को लेकर अब तक कई न्यायिक फैसले आ चुके हैं। दिसंबर 2019 में, तीस हजारी कोर्ट ने उसे बलात्कार पीड़िता के पिता की हिरासत में हत्या के मामले में 10 साल की सजा सुनाई थी। इसके अलावा, सेंगर को 25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था, जिसमें से 10 लाख रुपये पीड़िता को देने का आदेश था।

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