stray dog india: साहब ये मजाक है या अपमान; शिक्षकों को मिली ‘अनोखी’ ड्यूटी, करेंगे कुत्तों की गणना
stray dog india: आवारा कुत्तों से उत्पन्न समस्याओं का स्थाई समाधान अब तक नहीं मिल पाया है। देश में यह मसला एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले का संज्ञान लिए जाने के बावजूद स्थिति जस की तस है। केंद्र और राज्य सरकारें उलझन में हैं। डॉग लवर्स अलग से त्यौरियां चढ़ाए बैठे हैं। सड़कों पर आवारा कुत्तों का आतंक पहले जैसा है।
आवारा कुत्तों द्वारा सड़कों एवं पार्कों में नागरिकों पर जानलेवा हमला करने तथा रेबीज से मरीजों की मौत का चक्र बरकरार है। इसके इतर बिहार में शिक्षकों को आवारा कुत्तों की गणना की जिम्मेदारी सौंपे जाने और राजस्थान में यूनिवर्सिटी कैंपस में कुत्तों के प्रवेश को रोकने का दायित्व प्रोफेसरों को दिए जाने पर नया विवाद खड़ा हो गया है। नई जिम्मेदारी ने शिक्षकों की बेचैनी बढ़ा दी है। उन्हें अपना मान-सम्मान धूमिल होने की चिंता सता रही है।
सरकारी शिक्षक करेंगे कुत्तों की गणना
देश में वैसे भी शिक्षकों को शिक्षा से इतर अनेक कार्यों में सहयोग करना पड़ता है, मगर कुत्तों की गिनती व शिक्षण संस्थान परिसर से उन्हें दूर रखने की जिम्मेदारी ने उन्हें परेशानी में डाल दिया है। बिहार में सासाराम नगर निगम ने सरकारी शिक्षकों को कुत्तों की गणना करने का फरमान जारी किया है। यह आदेश न सिर्फ बेतुका है बल्कि हास्यास्पद भी है।
दरअसल अदालत के आदेश के अनुरूप स्थानीय निकायों की इस बाबत जवाबदेही तय की गई है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर उठते सवालों व गिरते परीक्षा परिणाम के बावजूद शिक्षकों को गैर-शिक्षण कार्यों में झोंक देना दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाएगा। वहीं, प्रत्येक छोटे-बड़े सरकारी अभियान में शिक्षकों की जिम्मेदारी तय करना प्रशासनिक विफलता को भी उजागर करता है।
शिक्षकों की बढ़ी मुश्किलें
कभी जनगणना, कभी चुनावी ड्यूटी तो कभी आपदा सर्वेक्षण और अब कुत्तों की गिनती का बेतुका काम शिक्षकों के जिम्मे लगा दिया गया है। आवारा कुत्तों की गिनती करना शिक्षण के कागजी कार्य के समान सहज नहीं है। निश्चित तौर पर अनेक शिक्षक ऐसे होंगे जो कुत्तों से डरते भी होंगे। खासकर शिक्षिकाओं के लिए यह कार्य चुनौतीपूर्ण हो सकता है। कुछ शिक्षक इस गणना प्रक्रिया में वास्तविक खतरे का सामना भी कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट इस बात पर जोर दे चुका है कि किसी कुत्ते के मन को पढ़ना या यह अनुमान लगाना असंभव है कि कोई जानवर कब आक्रामक हो जाएगा।
नतीजन अप्रशिक्षित शिक्षकों को ऐसे कार्य के लिए कहना, उनकी सुरक्षा के लिए भी चुनौती होगी। खासकर तब जब आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं और रेबीज से होने वाली जीवन क्षति सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है। ऐसे में नगर निगम के आदेश की तार्किकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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शीर्ष अदालत ने पशु जन्म नियंत्रण और जन सुरक्षा उपायों को लागू करने में नगर पालिकाओं की विफलता पर सवाल उठाए थे। इसके बाद एक स्थानीय निकाय ने अपनी मूल जिम्मेदारी शिक्षकों पर थोपकर इसका जवाब दिया है। यह अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसा है। बिहार में नगर निगम के फरमान का विरोध तेज हो गया है। विपक्षी दल भी इस मुद्दे को खूब उछाल रहे हैं।
उधर, राजस्थान के कोटा में यूनिवर्सिटी कैंपस को आवारा कुत्तों से महफूज रखने के लिए प्रोफेसरों की जवाबदेही तय किए जाने पर भी विवाद सामने आया है। इस जिम्मेदारी को प्रोफेसरों की तोहीन माना जा रहा है। कुल मिलाकर बिहार और राजस्थान में आवारा कुत्ते अब शिक्षकों के जी का जंजाल बन गए हैं।


