सज्जनों का उद्धार व दुर्जनों का संघार करने धरा धाम पर अवतरित होते हैं भगवान: डॉ मिश्र
मानव हृदय ही संसार सागर है। अच्छे और बुरे विचार ही देवता और दानव द्वारा किया जाने वाला मंथन है।

सुलतानपुर। जिसके अंदर का देवता जीत गया है। उसका जीवन सुखी, संतुष्ट और भगवत प्रेम से भरा गया है। उक्त उदगार चांदा के रामनगर गाँव में श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन वाराणसी से पधारे भागवताचार्य डॉ मदन मोहन मिश्रा महाराज ने व्यक्त किये।
डॉ मिश्र ने कथा को आगे बढ़ाते हुए भगवान के चौबीस अवतारों की कथा के साथ-साथ समुद्र मंथन की कथा सुनाया। भागवताचार्य ने कहा कि यह संसार भगवान का एक सुंदर बगीचा है। यहां चौरासी लाख योनियों के रूप में भिन्न- भिन्न प्रकार के फूल खिले हुए हैं। जब-जब कोई अपने गलत कर्मो द्वारा इस संसार रूपी भगवान के बगीचे को नुकसान पहुंचाने की चेष्टा करता है तब-तब भगवान इस धरा धाम पर अवतार लेकर सजनों का उद्धार और दुर्जनों का संघार किया करते हैं ।
समुद्र मंथन की कथा सुनाते हुए कहा कि मानव हृदय ही संसार सागर है। मनुष्य के अच्छे और बुरे विचार ही देवता और दानव के द्वारा किया जाने वाला मंथन है। कभी हमारे अंदर अच्छे विचारों का चितन मंथन चलता रहता है और कभी हमारे ही अंदर बुरे विचारों का चितन मंथन चलता रहता ।
इसके पूर्व मुख्यजजमान रामदुलार मिश्र ने व्यासपीठ का पूजन किया। अशोक कुमार मिश्र, एल पी सिंह, इंसाफ सिंह, विनोद मिश्र, प्रमोद मिश्र, विनय मिश्र ने माल्यार्पण कर अभिनन्दन किया। इस मौके पर बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालुओं ने कथा का रसास्वादन किया। संचालन विद्याधर तिवारी ने किया। व्यास पीठ से वरिष्ठ और विशिष्ट जनों को अंग वस्त्र, रुद्राक्ष, रामलला का चित्र देकर सम्मानित किया गया। बीच बीच में सुमधुर भजनों से वातावरण भक्तिमय हो गया।



