दवाओं के नाम इतने कठिन क्यों, जानिए इसके पीछे का वैज्ञानिक सच

Drug naming system: ये मेडिकल साइंस की एक बड़ी कामयाबी है कि मामूली सिरदर्द से लेकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों तक के लिए दवाएं उपलब्ध हैं। हालांकि, कई दवाओं के नाम ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़ना या बोलना भी मुश्किल होता है। और फिर डॉक्टरों की लिखावट—खैर, उस पर तो बात ही न करें! फार्मासिस्ट के अलावा शायद ही कोई और उसे समझ पाता है। जब पढ़े-लिखे लोगों को भी इसमें दिक्कत होती है, तो सोचिए अनपढ़ लोगों का क्या हाल होता होगा। मन में यह सवाल आता है: दवाओं के नाम आसान क्यों नहीं होते? उन्हें इतना मुश्किल क्यों बनाया गया? आइए जानते हैं।

चाहे फ़ार्मेसी पर हों या डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन हाथ में हो, यह सवाल कभी न कभी सबके मन में आता है! दवाओं के नाम बोलने और याद रखने में इतने मुश्किल क्यों होते हैं? ‘पैरासिटामोल’ तो शायद आसान लगे, लेकिन ‘हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन’ या ‘लेवोसेटिरिज़िन’ जैसे नाम बोलते समय ज़बान लड़खड़ा सकती है।

हालांकि, ये नाम मनमाने ढंग से नहीं चुने जाते। इनके पीछे अहम वैज्ञानिक कारण और अंतरराष्ट्रीय नियम होते हैं। आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि ये नाम कौन तय करता है और ये इतने मुश्किल क्यों होते हैं।

दवाओं के तीन तरह के नाम होते हैं!

किसी भी दवा को मुख्य रूप से तीन तरह के नामों में बांटा जाता है:

केमिकल नाम: यह दवा के मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर (अणु संरचना) के आधार पर तय किया जाता है। यह नाम अक्सर बहुत मुश्किल होता है और आम लोगों की समझ से बाहर होता है (जैसे, N-(4-हाइड्रॉक्सीफेनिल)एसिटामाइड)।

जेनेरिक नाम (INN): यह दवा के एक्टिव इंग्रीडिएंट (मुख्य घटक) का आधिकारिक ग्लोबल नाम होता है। यह दुनिया भर में एक जैसा रहता है (जैसे, पैरासिटामोल)।

यह भी पढ़ें: ज़रा हटके: चांदी की चीज़ों को हमेशा गुलाबी कागज़ में क्यों लपेटा जाता है? लाल या पीले कागज़ में क्यों नहीं? ब्रांड का नाम: यह वह आसान नाम है जो दवा बनाने वाली कंपनी बिक्री के मकसद से दवा को देती है (जैसे, Crocin, Dolo)।

दवा का नाम कौन तय करता है?

  • दवा का जेनेरिक नाम तय करने का काम दुनिया भर में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन (WHO) करता है।
  • WHO की एक खास एक्सपर्ट कमिटी है जो INN (इंटरनेशनल नॉन-प्रोपराइटरी नेम्स) के लिए काम करती है।
  • जब दुनिया में कोई कंपनी नई दवा खोजती है, तो उसे नाम के लिए इस कमिटी को अप्लाई करना होता है।
  • कमिटी दवा के कंपोज़िशन, काम और नेचर के आधार पर एक स्टैंडर्ड नाम तय करती है।

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नाम इतने मुश्किल और अजीब क्यों लगते हैं?

दवाओं के नामों में अक्सर ‘सफिक्स’ (शब्द के आखिर में जुड़ने वाला हिस्सा) या ‘स्टेम’ होता है। इससे डॉक्टर या फार्मासिस्ट तुरंत समझ जाते हैं कि दवा किस बीमारी का इलाज करती है या शरीर के किस हिस्से पर असर करती है:

  • -olol: ये दवाएं हाई ब्लड प्रेशर के लिए होती हैं (जैसे, Atenolol, Metoprolol)।
  • -cillin: ये एंटीबायोटिक्स हैं (जैसे, Penicillin, Amoxicillin)।
  • -mab: ये कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं हैं (जैसे, Rituximab)।
  • -prazole: ये एसिडिटी की दवाएं हैं (जैसे, Omeprazole, Pantoprazole)।

चूंकि साइंटिस्ट्स को इन नियमों का पालन करना होता है, इसलिए वे अपनी पसंद का कोई भी आसान नाम नहीं चुन सकते!

कंफ्यूजन से बचने के लिए सख्त नियम!

बाज़ार में एक ही बीमारी के लिए सैकड़ों दवाएं मौजूद हैं। अगर दो दवाओं के नाम सुनने या देखने में एक जैसे हों, तो डॉक्टर या फार्मासिस्ट के गलत दवा देने का खतरा हो सकता है।

इसीलिए दो दवाओं के नामों के बीच कम से कम 50% का अंतर होना ज़रूरी है। WHO की कमिटी उच्चारण या स्पेलिंग में एक जैसे नामों को तुरंत रिजेक्ट कर देती है।

 

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