लाल छोड़ नीला क्यों हुई समाजवादी पार्टी, अखिलेश के नए दांव से यूपी की सियासत में हलचल

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सूबे के सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए एक नया और रणनीतिक दांव चल दिया है।
समाजवादी पार्टी अब अपने पारंपरिक लाल रंग के साथ-साथ नीले रंग के संगम में भी दिखाई देगी। इस नए बदलाव की शुरुआत पार्टी की छात्र इकाई से की गई है, जहां समाजवादी छात्रसभा के कार्यकर्ताओं के लिए अब लाल के स्थान पर नीली टी-शर्ट अनिवार्य कर दी गई है। खास बात यह है कि इस नई नीली टी-शर्ट पर पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल के साथ संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर को प्रमुखता से स्थान दिया गया है।
नीले गमछे के बाद अब टी-शर्ट, दलित मतों पर सपा की नजर
पार्टी के प्रतीकों में यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है। हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान खुद अखिलेश यादव भी गले में नीला गमछा डाले नजर आए थे। भारतीय राजनीति में नीले रंग को सीधे तौर पर दलित चेतना और बहुजन समाज पार्टी की पहचान से जोड़कर देखा जाता है, क्योंकि बसपा का झंडा और चुनाव चिन्ह दोनों ही नीले रंग में रंगे हैं। जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव का यह कदम सीधे तौर पर बहुजन समाज और युवा पीढ़ी के मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने का सुविचारित प्रयास है।
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21 फीसदी दलित आबादी और बदलता सियासी गणित
उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में दलित मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 21 फीसदी आंकी जाती है। हाल के चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के कमजोर होते प्रदर्शन के बीच समाजवादी पार्टी इस बड़े वोट बैंक में अपनी मजबूत पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीतकर राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी सपा अब ‘जेन-जी’ यानी नई पीढ़ी के दलित युवाओं को अपने पाले में लाने के लिए प्रतीकों और विचारधारा का सहारा ले रही है।



