नाग पंचमी विशेष: भारत के 5 रहस्यमयी नाग मंदिर जो दूर करते हैं काल सर्प दोष

Nag Panchami 2026: सावन मास की शुक्ल पंचमी यानी नाग पंचमी सनातन धर्म में एक अत्यंत पवित्र तिथि है। भोलेनाथ के आभूषण माने जाने वाले नाग देवता की आराधना से जीवन के कई बड़े संकट टल जाते हैं। भारत भूमि पर नागों को समर्पित कई प्राचीन तीर्थ स्थल मौजूद हैं। इन पवित्र स्थानों पर दुग्धाभिषेक करने और शीश नवाने से काल सर्प दोष जैसी बड़ी बाधाएं भी खत्म हो जाती हैं। आइए आस्था और चमत्कारों से भरे देश के पांच प्रमुख नाग मंदिरों की एक आध्यात्मिक यात्रा पर चलते हैं।
उज्जैन का नाग चंद्रेश्वर धाम
महाकाल की नगरी उज्जैन में एक ऐसा अद्भुत तीर्थ है जिसके कपाट पूरे वर्ष बंद रहते हैं। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के सबसे ऊपरी तल पर स्थित नाग चंद्रेश्वर मंदिर के दर्शन केवल नाग पंचमी के दिन ही किए जा सकते हैं। यहां शिवलिंग को नाग देवता ने अपने घेरे में लिया हुआ है। इस एक दिन के शुभ मुहूर्त में दर्शन पाने के लिए पूरे देश से भक्तों का भारी हुजूम उमड़ता है।
मन्नारशाला नागराज मंदिर
दक्षिण भारत के केरल राज्य में हरिपद के घने जंगलों के बीच यह अति प्राचीन तीर्थ स्थित है। यहां भगवान नागराज और देवी नागयक्षी की संयुक्त रूप से उपासना होती है। मंदिर परिसर में करीब तीस हजार सर्प प्रतिमाएं स्थापित हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जिन जातकों की कुण्डली में सर्प दोष होता है उनके लिए यहां की गई विशेष पूजा अचूक फलदायी साबित होती है।
कुक्के सुब्रमण्यम तीर्थ
कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ इलाके में प्राकृतिक सौंदर्य के बीच यह पावन स्थल बसा है। नदी और ऊंचे पहाड़ों से घिरे इस सुरम्य मंदिर में देव सेनापति भगवान सुब्रमण्यम के साथ नाग वासुकि पूजे जाते हैं। शांति और हरियाली से भरे इस स्थान पर मुख्य रूप से सर्प दोष से मुक्ति के अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं।
भुजंग नागराज का ऐतिहासिक स्थल
गुजरात के भुज शहर से सटी पहाड़ियों पर एक बेहद अनूठा और ऐतिहासिक देवस्थान मौजूद है। यह तीर्थ एक सम्मानित नागा योद्धा को समर्पित है। किवदंतियों के मुताबिक इस वीर ने विदेशी आक्रांताओं से इस पूरे क्षेत्र को बचाया था। धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह जगह ट्रेकिंग और प्राकृतिक नजारों के लिए भी पर्यटकों की पहली पसंद बनी हुई है।
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प्रयागराज का श्री नागवासुकि मंदिर
तीर्थराज प्रयाग में गंगा तट पर श्री नागवासुकि का सुप्रसिद्ध धाम स्थापित है। धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान शरीर पर आए घावों की जलन शांत करने के लिए नागराज वासुकि ने श्रीहरि विष्णु के निर्देश पर यहीं विश्राम किया था। मान्यता है कि संगम में आस्था की डुबकी लगाने के बाद नागवासुकि के दर्शन करने से ही तीर्थ यात्रा पूरी मानी जाती है।



