मिडिल ईस्ट में तनाव का सीधा असर: भारत के मेडिकल स्टोर्स में खत्म हुआ इस गंभीर बीमारी का स्टॉक!

Hormuz Crisis Impact: मिडिल ईस्ट में तनाव और होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में संकट का असर अब सिर्फ़ कच्चे तेल और गैस की सप्लाई तक सीमित नहीं है; यह सीधे मरीज़ों की जान के लिए खतरा बन गया है। पिछले दो हफ़्तों से, कैंसर की दो ज़रूरी और सस्ती दवाएं देश भर के मेडिकल स्टोर से पूरी तरह गायब हो गई हैं। कैंसर के इलाज (कीमोथेरेपी) के लिए ज़रूरी दवाओं—’सिसप्लेटिन’ (Cisplatin) और ‘कार्बोप्लेटिन’ (Carboplatin) के बाज़ार में कहीं भी न मिलने पर कैंसर विशेषज्ञों ने गहरी चिंता जताई है।
10 में से 7 मरीज़ों को इन्हीं दवाओं की ज़रूरत होती है
सर गंगा राम अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. श्याम अग्रवाल ने कहा, “हमारे अस्पताल की फ़ार्मेसी में सिसप्लेटिन और कार्बोप्लेटिन का स्टॉक पूरी तरह खत्म हो गया है। OPD में आने वाले हर दस में से सात मरीज़ों को इन दवाओं की ज़रूरत होती है। ये दवाएं मुंह, फेफड़े, गर्भाशय, अंडाशय, भोजन नली और ब्रेस्ट के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में बहुत असरदार हैं।” इस कमी के कारण मरीज़ और उनके परिजन दवा की तलाश में एक फ़ार्मेसी से दूसरी फ़ार्मेसी तक भागने को मजबूर हैं।
प्लैटिनम की कीमतें आसमान छू रही हैं!
मुंबई के लीलावती अस्पताल और रिसर्च सेंटर के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. मोहन मेनन के अनुसार, प्लैटिनम से बनने वाली सभी कीमोथेरेपी दवाओं की बाज़ार में भारी कमी है। इन दवाओं के लिए ज़रूरी कच्चे माल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आसमान छू रही है। प्लैटिनम की कीमत, जो 2023 के मध्य में ₹2,700 प्रति ग्राम थी, अब बढ़कर ₹7,800 प्रति ग्राम से ज़्यादा हो गई है। दक्षिण अफ्रीका—जो दुनिया का सबसे बड़ा प्लैटिनम सप्लायर है—में उत्पादन घटने और ग्रीन हाइड्रोजन सेक्टर में बढ़ती मांग के कारण कीमतें पहले ही बढ़ चुकी थीं; अब होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संकट के कारण स्थिति और भी बेकाबू हो गई है।
थोक स्टॉक खत्म
दिल्ली की एक बड़ी रिटेल फ़ार्मेसी के मालिक ने कहा, “देश भर के ज़्यादातर मेडिकल स्टोर में स्टॉक खत्म हो गया है। यहां तक कि थोक विक्रेताओं और स्टॉकिस्टों के पास भी कोई सप्लाई नहीं बची है। जिनके पास थोड़ा-बहुत स्टॉक है भी, वे रिटेलर्स को सप्लाई करने के बजाय सीधे मरीज़ों को बेच रहे हैं।” खासकर इन दवाओं के कम-डोज़ वाले वर्शन बाज़ार से पूरी तरह गायब हो गए हैं।
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सरकारी नियमों के कारण कंपनियों के हाथ बंधे हैं
कच्चे माल और ट्रांसपोर्टेशन की बढ़ती लागत के बावजूद फ़ार्मास्युटिकल कंपनियां कीमतें नहीं बढ़ा पा रही हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि दोनों दवाएं सरकार के ‘ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर’ (DPCO) के दायरे में आती हैं, जो देश में ज़रूरी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करता है। DPCO के नियम कंपनियों को औसत थोक महंगाई दर के आधार पर सालाना कीमतों में मामूली बढ़ोतरी करने की ही इजाज़त देते हैं। नतीजतन, जानकारों का मानना है कि बढ़ती लागत के कारण कंपनियों ने उत्पादन कम कर दिया है या रोक दिया है। कैंसर से जूझ रहे बेकसूर मरीज़ अब इस अंतरराष्ट्रीय टकराव और घरेलू नीतियों के बीच फँस गए हैं।



