0 सीट लेकिन 19% वोट, भाजपा के इन चौंकाने वाले आंकड़ों ने केरल की राजनीति में मचाया तहलका

Kerala Assembly Election 2026: केरल की राजनीति लंबे समय से दो प्रमुख गठबंधनों एलडीएफ और यूडीएफ के इर्द-गिर्द घूमती रही है। मगर अब हाल के चुनावी रुझान यह संकेत दे रहे हैं कि राज्य के मतदाता धीरे-धीरे एक तीसरे विकल्प पर भी विचार करने लगे हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का बढ़ता वोट शेयर इसी बदलाव का संकेत है, भले ही उसे अब तक विधानसभा में सीट नहीं मिल पाई हो।

2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को लगभग 12.41 प्रतिशत वोट मिले थे, मगर सीटों के मामले में वह शून्य पर ही रहा। इसके विपरीत एलडीएफ ने 99 सीटें जीतीं और यूडीएफ ने 41 सीटों पर कब्जा किया। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव और 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन ने नए समीकरण खड़े किए हैं।

मतदाताओं का झुकाव: क्या बदल रही है प्राथमिकताएं?

राज्य के कई शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में मतदाता अब विकास, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देने लगे हैं। भाजपा इन मुद्दों को जोर-शोर से उठा रही है, जिससे उसे नई जमीन मिल रही है। खासकर युवा और मध्यम वर्ग के मतदाता इस बदलाव में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

नेमोम: करीबी मुकाबलों से उम्मीदें जिंदा

तिरुवनंतपुरम की नेमोम सीट इस बदलाव की एक अहम मिसाल है। 2016 में यहां भाजपा को जीत मिली थी, मगर 2021 में बेहद कम अंतर से यह सीट उसके हाथ से निकल गई। अब पार्टी फिर से यहां मजबूत वापसी की कोशिश कर रही है।

स्थानीय स्तर पर लोगों में सरकार के प्रति कुछ असंतोष जरूर दिख रहा है, मगर केरल की पारंपरिक द्विध्रुवीय राजनीति अभी भी भाजपा के लिए चुनौती बनी हुई है। ऐसे में केवल नाराजगी के सहारे जीत हासिल करना आसान नहीं होगा।

त्रिशूर: सामाजिक समीकरणों का नया प्रयोग

त्रिशूर जिला भाजपा के लिए सबसे संभावनाशील क्षेत्र बनकर उभरा है। यहां लोकसभा चुनाव में पार्टी को बढ़त मिली थी, जिससे उसका आत्मविश्वास बढ़ा है। ईसाई और एझवा समुदाय के कुछ वर्गों में समर्थन बढ़ने से भाजपा को फायदा हुआ है।

यहां बेरोजगारी और कल्याणकारी योजनाओं को लेकर चर्चा तेज है। मतदाता अब इन मुद्दों पर सरकार से जवाब चाहते हैं, जिससे चुनावी मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।

दक्षिण केरल में बढ़ती पकड़

तिरुवनंतपुरम और आसपास के क्षेत्रों में भाजपा ने कई सीटों पर मजबूत प्रदर्शन किया है। कुछ जगहों पर वह दूसरे स्थान पर रही, जबकि कुछ में मामूली अंतर से हार मिली। यह दर्शाता है कि पार्टी धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत कर रही है।

पलक्कड़ जैसे शहरी इलाकों में स्थानीय निकाय चुनावों में लगातार जीत ने यह साबित किया है कि मतदाता विकल्प तलाश रहे हैं। यहां शिक्षित वर्ग विकास आधारित राजनीति को प्राथमिकता दे रहा है।

आंकड़ों की कहानी: वोट बढ़े, सीटें अभी दूर

हाल के चुनावों में भाजपा ने लगभग 19 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल किए, जो पहले की तुलना में बड़ी बढ़त है। कई विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी पहले स्थान पर रही, जबकि कई में उपविजेता बनी।

फिर भी सीटों में इस वोट को बदलना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। राज्य में एलडीएफ और यूडीएफ के बीच मजबूत ध्रुवीकरण भाजपा की राह मुश्किल करता है।

स्थानीय जीत से बढ़ा मनोबल

2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में एनडीए ने लगभग 2,000 वार्डों में जीत हासिल की। इससे यह संकेत मिलता है कि जमीनी स्तर पर पार्टी का नेटवर्क मजबूत हो रहा है। उपचुनावों में भी मिली सफलताओं ने कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया है।

आगे की राह: क्या टूटेगा पुराना ढांचा?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भाजपा 10-15 करीबी मुकाबलों वाली सीटों को अपने पक्ष में कर लेती है, तो वह राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है। हालांकि, इतिहास अभी भी पारंपरिक दलों के पक्ष में दिखाई देता है।

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आने वाले 2026 विधानसभा चुनाव इस बात का फैसला करेंगे कि क्या केरल के मतदाता तीसरे विकल्प को पूरी तरह अपनाने के लिए तैयार हैं या फिर पुराना राजनीतिक बैलेंस बरकरार रहेगा।

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