किराया मांगा तो बेड बॉक्स में मिले लाश के टुकड़े, क्या अब कानून भी नहीं रोक पाएगा ऐसी वारदातें

गाजियाबाद कांड– समाज में विश्वास का संकट निरंतर गहरा रहा है। अटूट भरोसा कब टूट जाए, कोई नहीं जानता। प्रॉपर्टी और पैसा आज इंसान व रिश्तों से बढ़कर हो चुके हैं। जिसके लिए मन में हमदर्दी होती है, अक्सर वही धोखा दे जाता है। किसी पर आंख मूंदकर भरोसा करना अब समझदारी नहीं है। गाजियाबाद की राजनगर एक्सटेंशन कॉलोनी में कुछ दिन पहले बेहद खौफनाक वारदात सामने आई थी। किराएदार दंपति द्वारा मकान मालकिन की निर्मम हत्या कर दिए जाने की खबर ने हर किसी को विचलित कर दिया।
फ्लैट ऑनर छह माह का बकाया किराया वसूलने के लिए पहुंची थी, मगर महिला को इस बात का रत्ती भर शक नहीं था कि वहां मौत उनका इंतजार कर रही है। बकाया किराया अदा करने की बजाए किरादार दंपति ने पहले फ्लैट ऑनर की गला दबाकर हत्या कर दी। बाद में शव को ठिकाने लगाने के मकसद से छोटे-छोटे टुकड़े कर बेड बॉक्स के भीतर छिपा दिया।
किराए की नब्बे हजार की बकाया राशि का भुगतान न करना पड़े, इसके लिए आरोपी दंपति ने जो कदम उठाया, वह वाकई वीभत्स व दुर्भाग्यपूर्ण है। सभ्य समाज में इस प्रकार की घटना को स्वीकार करना संभव नहीं है। समाज में मकान मालिक और किराएदारों से जुड़े विवाद अक्सर सामने आते हैं। किराए से संबंधित विवादों के मामले बड़ी संख्या में अदालत में विचाराधीन भी हैं। केंद्र सरकार ने हाल ही में कानून में संशोधन किया है। कानून में संशोधन से इस प्रकार के विवाद रूक पाएंगे, ऐसा संभव नहीं लगता।
मकान या दुकान को किराए पर उठाते समय ऑनर आमतौर पर किरायेदार का पुलिस से सत्यापन कराने की जहमत नहीं उठाते। मकान मालिक को लगता है सत्यापन प्रक्रिया के नाम पर पुलिस बेवजह परेशान करेगी। दस सवाल पूछेगी। मुश्किल से किराएदार मिला है, वह भी भाग जाएगा। प्रॉपर्टी ऑनर की यह मानसिकता अक्सर उनके लिए दुखदायी साबित होती है।
किराएदार दंपति का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं
हालांकि राजनगर एक्सटेंशन केस में गिरफ्तार किराएदार दंपति का कोई आपराधिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया है। पुलिस का मानना है कि फ्लैट खाली करने का दबाव बनाए जाने तथा किराए पर उभरे विवाद में आवेश में आकर दंपति ने जघन्य वारदात को अंजाम दिया। फ्लैट ऑनर की गलती यह रही कि वह किराएदार पर भरोसा कर अकेले किराए का तकादा करने जा पहुंची थीं। उन्हें कतई उम्मीद नहीं रही होगी कि जान पर संकट आ सकता है। कुल मिलाकर यह घटना चिंताजनक है।
गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर में पिछले कुछ साल में प्रॉपर्टी को किराए पर देने का कारोबार खूब फला-फूला है। इसके जरिए ऑनर को प्रतिमाह मोटी कमाई होती है। खासकर औद्योगिक क्षेत्रों से सटी आवासीय कॉलोनियों में किराएदारों की भरमार है। छोटे-छोटे कमरों में वह अपनी गुजर-बसर करते हैं। प्रत्येक मकान मालिक और किराएदार के बीच भरोसे का रिश्ता होता है।
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भरोसा टूटने पर संबंधों में कड़वाहट आने लगती है। कोरोना काल में कई मकान मालिकों ने इंसानियत का परिचय देकर किराया माफ कर किराएदारों की हर संभव मदद की थी। जबकि कुछ मकान मालिक ऐसे भी थे, जिन्होंने किराएदार की परेशानी को दरकिनार कर बकाया किराया वसूलने के बाद ही उनका पीछा छोड़ा था। बात सिर्फ अच्छा इंसान होने की है। नेक इंसान मकान मालिक भी हो सकता है, और किराएदार भी। यदि दोनों अच्छे होंगे तो अटूट भरोसा कभी नहीं टूटेगा। न मकान मालिक को संपत्ति पर कब्जा होने का डर सताएगा, न किराएदार पर असमय मकान खाली करने की नौबत आएगी।



