6 राज्यों में 16 मौतें, वजह SIR प्रक्रिया; हिल गई केंद्र सरकार

SIR प्रक्रिया: 6 राज्य, 19 दिन और 16 बीएलओ की मौत। केरल, तमिलनाडु, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश व गुजरात में खुदकुशी, हार्ट अटैक तथा हादसे में सिलसिलेवार तरीके से बीएलओ की मौत पर अब राजनीतिक बखेड़ा बढ़ गया है। देश के विभिन्न राज्यों में जारी मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआईआर) की प्रक्रिया पर निरंतर सियासी विवाद सामने आ रहा है। 6 राज्यों में 16 बीएलओ की मौत का आंकड़ा सामने आने पर कांग्रेस हमलावर मुद्रा में है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा है कि एसआईआर की प्रक्रिया एक थोपा गया जुल्म और नागरिकों को परेशान करने की सोची-समझी चाल है। उन्होंने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर फिर से निशाना साधा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि एसआईआर में जल्दबाजी में क्रियान्वयन नोटबंदी और कोविड-19 लॉकडाउन की याद दिलाता है।
SIR प्रक्रिया का खुलकर विरोध कर रही हैं ममता
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी एसआईआर का खुलकर विरोध कर रही हैं। हालांकि चुनाव आयोग पीछे हटने के मूड में नहीं है। देश में मोदी सरकार समय-समय पर कुछ ऐसे कदम उठाती रही है, जिस पर राजनीतिक विवाद होता रहा है। ऐसे में आमजन से ज्यादा विपक्ष ने शोर मचाया है। जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाने, जीएसटी लागू करने, नोटबंदी से लेकर कोरोनाकाल में लॉकडाउन लगाने जैसे कदम विपक्ष को कभी रास नहीं आए हैं। अब मतदाता सूची में सुधार की दृष्टि से एसआईआर का सहारा लिया गया है। इस पर भी विपक्ष आक्रामक हो चुका है।
एसआईआर में ठोस प्लानिंग का अभाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार कहा था कि खराब व्यवस्थाओं में व्यापक सुधार लाने को वह कड़वी डोज देने से पीछे नहीं हटेंगे। वैसे बात चाहे नोटबंदी की हो, लॉकडाउन के निर्णय की या एसआईआर प्रक्रिया आरंभ किए जाने की, एक बात कॉमन है कि इस दौरान ठोस प्लानिंग का अभाव रहा है। एसआईआर को निर्धारित अवधि में पूर्ण करने के लिए बीएलओ पर काम का जबरदस्त दबाव है।
चुनाव आयोग की सख्ती के कारण प्रशासनिक अधिकारी किसी प्रकार की नरमी नहीं बरत रहे हैं। नतीजा मानसिक तनाव हावी होने से बीएलओ को परेशानी बढ़ना स्वाभाविक है। आखिर बीएलओ भी इंसान हैं। फिर ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों को समय से काम निपटाने की आदत नहीं होती। जो कर्मचारी सिर्फ घर से ऑफिस और ऑफिस से घर जाने की ड्यूटी करते रहते हैं, उन्हें फील्ड में जाकर दिनभर काम करने में दिक्कत आती हैं। चूंकि इसके लिए उन्हें अपनी दिनचर्या में बड़ा बदलाव लाना होता है।
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सरकारी दफ्तर में एक फाइल को एक से दूसरी टेबल तक पहुंचने में ही लंबा वक्त लग जाता है। कार्मिकों की कार्यशैली धीमी गति से काम करने की होती है। चुनाव आयोग को बीएलओ की उन दिक्कतों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए, जो वह प्रतिदिन झेल रहे हैं। तनाव के माहौल में काम करने का परिणाम कभी अच्छा नहीं निकलता।
विपक्ष को भी इस मुद्दे पर सियासत करने की बजाए एसआईआर प्रक्रिया को सुधारात्मक तरीके से आगे बढ़ाने का सुझाव देना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि मतदाता सूचियों में ढेरों खामियां मौजूद हैं। कहीं मृतकों के नाम काटे नहीं गए हैं तो कहीं जीवित व्यक्तियों के नाम सूची से गायब हैं। अवैध घुसपैठियों के वोट भी बन चुके हैं। इन तमाम अशुद्धियों को दूर किया जाना जरूरी है। एसआईआर प्रक्रिया आमजन को परेशान करने का अभियान कतई नहीं हो सकती है।



