O Romeo movie review: माफिया क्वीन, गैंगस्टर रोमियो और बदले की आग: क्या ‘ओ’रोमियो’ देखने लायक है या सिर्फ समय की बर्बादी
विक्रांत मैसी की मौत और शाहिद का बदला! 'ओ'रोमियो' में वो कमियां जो फिल्म को 'ब्लॉकबस्टर' बनने से रोकती हैं।

O Romeo movie review: जब शाहिद कपूर और विशाल भारद्वाज ने अपनी नई फिल्म के लिए साथ काम करने की घोषणा की, तो सिनेमा प्रेमी बेहद खुश हुए। और क्यों न होते? शाहिद कपूर और विशाल भारद्वाज ने पहले भी हैदर और कमीने जैसी फिल्मों से समीक्षकों और दर्शकों दोनों को खूब सफलता दिलाई है। इसलिए, जब ओ रोमियो की घोषणा हुई, तो हमारी उम्मीदें और भी बढ़ गईं। और फिल्म पहले हाफ में वाकई रफ्तार पकड़ती है, मगर अंत में आते-आते इसकी रफ्तार धीमी हो जाती है।
आप जानते हैं विल भारद्वाज की फिल्मों का एक खास माहौल होता है। ये माहौल देर तक बना रहता है। यह खुद को जल्दी समझाने की कोशिश नहीं करता। और ‘ओ रोमियो’ में भी यही माहौल प्यार, हिंसा और उसके नीचे छिपी किसी कोमल भावना को समेटने की कोशिश करता है। हालांकि, फिल्म के दूसरे भाग में यह नाजुक आवरण खुलने लगता है ।
फिल्म में क्या कहानी दिखाी गई है
ओ रोमियो हुसैन जैदी की किताब ‘माफिया क्वींस ऑफ मुंबई’ पर आधारित है। विशाल भारद्वाज ने किरदारों के साथ कुछ बदलाव किए हैं। फिल्म में उस्तारा (शाहिद कपूर द्वारा अभिनीत) जैसे किरदारों का भी इस्तेमाल किया गया है। वह एक गैंगस्टर है जो तृप्ति डिमरी की अफशान से प्यार करने के बाद ‘रोमियो’ बन जाता है और उसके साथ हुए अत्याचार – उसके पति (विक्रांत मैसी द्वारा अभिनीत) की जलाल (अविनाश तिवारी) के हाथों हुई मौत – का बदला लेने निकल पड़ता है। अंत में दुष्ट जलाल मारा जाता है या नहीं, उस्तारा को कैसे प्यार होता है, अफशान अपने बचपन के प्रेमी की मौत का बदला कैसे लेती है – यही कहानी का मुख्य केंद्र है।
ओ रोमियो में कहां कमी रह गई
यह सब एक साथ नहीं होता। दरारें धीरे-धीरे शुरू होती हैं। पहला भाग आपको अपनी ओर खींच लेता है। इसमें माहौल है, तनाव है, विशाल भारद्वाज की जानी-पहचानी लय है जहाँ सब कुछ परतदार और थोड़ा अप्रत्याशित लगता है। आप धीरे-धीरे बढ़ते तनाव को महसूस करते हैं। किसी गहरी चीज़ का वादा।
मगर दूसरा भाग उस वादे को निभाने में नाकाम रहता है। पटकथा ढीली पड़ने लगती है। जो पहले कसा हुआ और नियंत्रित लग रहा था, वह धीरे-धीरे बिखरने लगता है, मानो कोई नाजुक धागा हो जिसे आप संभाल न सकें। गति धीमी हो जाती है। दृश्य ज़रूरत से ज़्यादा लंबे खिंच जाते हैं, और जो भावनात्मक तीव्रता पहले धीमी लग रही थी, वह असमान हो जाती है।
कहानी में कई मोड़ हैं, हां। यह आपको चौंकाने की कोशिश भी करती है। मगर एक बिंदु के बाद वे मोड़ असरदार नहीं रह जाते। वे चौंकाते नहीं, प्रभावित नहीं करते, टिकते नहीं। आपको उनका पहले से ही अंदाजा हो जाता है, या इससे भी बुरा, जब वे आते हैं तो आपको उतना रोमांच महसूस नहीं होता।
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फिल्म का मुख्य भावनात्मक पहलू, जो फिल्म को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है, भी उतना प्रभावशाली नहीं रह पाता जितना होना चाहिए। प्रेम और हिंसा का एक साथ मौजूद होना, यहाँ तक कि सबसे क्रूर किरदारों में भी एक कोमल भावना होना, ये विचार आकर्षक तो है मगर उत्तरार्ध में इसे आवश्यक गहराई से नहीं दर्शाया गया है।
तो भले ही फिल्म देखने में खूबसूरत लगे और कुछ हिस्सों में काव्यात्मक भी महसूस हो, मगर यह अपनी पकड़ खो देती है। और यहीं पर ओ रोमियो लड़खड़ा जाती है।


