चवन्नी, इकन्नी और 16 आने! पश्चिमी यूपी में सिक्कों की जुबानी जंग से गरमाई सियासत

Akhilesh Yadav Chavanni Remark: दशकों पहले चलन से बाहर हो चुका ‘चवन्नी’ का सिक्का आज उत्तर प्रदेश की सियासत का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है। पश्चिमी यूपी के सियासी रण में ‘चवन्नी’ से लेकर ‘इकन्नी’ और ’16 आने’ तक के जुबानी तीर चलाए जा रहे हैं। साल 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सत्ता की होड़ में शामिल समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने-अपने सियासी सिक्के चमकाने और 16 आने वोट बैंक को अपने पाले में लाने की पुरजोर कोशिश में जुट गए हैं।

सपा प्रमुख का तंज, रालोद ने बनाया जाट स्वाभिमान का मुद्दा

विवाद की शुरुआत सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा अपने पूर्व सहयोगी और रालोद प्रमुख जयंत चौधरी पर कसे गए ‘चवन्नी को रुपया’ बनाने वाले तंज से हुई। जयंत चौधरी और रालोद ने इस बयान को सीधे जाट समाज के आत्मसम्मान और स्वाभिमान से जोड़ दिया। इसके तुरंत बाद भाजपा के फायरब्रांड नेता और पूर्व विधायक संगीत सोम भी मैदान में कूद पड़े। सोम ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जिन्हें अखिलेश ने चवन्नी कहा है, वे 2027 के चुनाव में सपा को ‘एक आने (इकन्नी)’ का भी नहीं छोड़ेंगे।

अंकित बालियान हत्याकांड: शामली में पीड़ित परिवार से संपर्क और ‘गोत्र’ की एंट्री

शामली के हरियाणवी गायक अंकित बालियान की नृशंस हत्या के मामले ने पश्चिमी यूपी के राजनीतिक पारे को और चढ़ा दिया है। सपा सांसद इकरा हसन और विधायक नाहिद हसन ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की, जिसके बाद अंकित के पिता सतवीर सिंह से अखिलेश यादव ने फोन पर सीधी बातचीत कर न्याय की लड़ाई में हरसंभव मदद का भरोसा दिया। इसके बाद अखिलेश ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर पोस्ट साझा करते हुए ‘जाट समाज’ के बजाय ‘बालियान समाज’ शब्द का इस्तेमाल किया। बालियान जाटों का एक प्रमुख गोत्र है, जिसे विश्लेषक जातिगत राजनीति को गोत्र के स्तर तक ले जाकर पश्चिमी यूपी में पैठ मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं।

भाजपा-रालोद गठबंधन का मजबूत किला बनाम सपा का PDA फॉर्मूला

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जमीन पर असली खींचतान जाट-किसान और ओबीसी जनाधार को लेकर है। भाजपा लंबे समय से जाट, गुर्जर, त्यागी और सैनी जैसे किसान व ओबीसी वर्गों को एकजुट रखने में जुटी है। रालोद के साथ गठबंधन के बाद भाजपा के लिए जाट वोटरों को एकजुट रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता बन चुका है। उधर पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर आगे बढ़ रही सपा पश्चिमी यूपी में जाट समाज से किसी भी तरह की दूरी का जोखिम नहीं लेना चाहती, इसलिए ‘चवन्नी’ वाले बयान को गठबंधन टूटने की टीस और सामान्य तंज बताकर डैमेज कंट्रोल किया जा रहा है।

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2027 की सत्ता की चाबी: 16 आने फैसले पर टिकी दलों की किस्मत

रालोद सुप्रीमो जयंत चौधरी ने सपा प्रमुख के बयानों को संवेदनहीन करार देकर स्पष्ट कर दिया है कि वे इसे किसान और जाट अस्मिता से जोड़े रखेंगे। ‘चवन्नी’ का सियासी विवाद जितना लंबा खिंच रहा है, पश्चिमी यूपी में इसका चुनावी वजन उतना ही बढ़ रहा है। 2027 के महामुकाबले में असली सवाल यह नहीं रहेगा कि चवन्नी कौन था, बल्कि यह तय होगा कि पश्चिमी यूपी का मतदाता अपनी 16 आने ताकत से किसके सिर जीत का सेहरा बांधता है।

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