क्या अब बंगाल में लागू होगा राष्ट्रपति शासन, ममता बनर्जी के ‘इस्तीफा न देने’ के पीछे क्या है असली मास्टरप्लान

मैं हारी नहीं हूं, इसलिए मैं राजभवन नहीं जाऊंगी। मैं इस्तीफा नहीं दूंगीं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह बयान देकर देश की सियासत में हलचल मचा दी है। वह सीएम पद से इस्तीफा न देने की जिद पर अड़ गई हैं। ऐसे में संवैधानिक और सियासी संकट पैदा हो गया है। आजादी के बाद देश में यह पहला मामला है जब किसी पराजित मुख्यमंत्री ने इस प्रकार की मानसिकता का परिचय दिया है। ममता बनर्जी की जिद के कारण दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का आज दुनिया भर में उपहास उड़ रहा है। चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।
बंगाल में हाई वोल्टेज ड्रामा
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव के उपरांत किसी न किसी मुद्दे पर हाईवोल्टेज ड्रामा देखने को मिला है। विस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने रिकॉर्ड 206 सीटें जीती हैं। जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई है। जनादेश भाजपा के पक्ष में आया है, मगर ममता बनर्जी अपनी करारी हार को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। इसके चलते उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में पिछले पंद्रह साल से वह सत्ता का सुख भोग रही थीं। सत्ता हाथ से जाने पर वह बौखला गई हैं। इस राज्य में विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को पूरा हो रहा है। तदुपरांत विस भंग होने पर मुख्यमंत्री की शक्तियां अपने आप समाप्त हो जाएंगी।
भाजपा ने टीएमसी सुप्रीमो के रवैये की खुलकर निंदा की है। ममता बनर्जी के समर्थन में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी सामने आए हैं। राहुल ने असम और पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों पर सवाल खड़े किए हैं। जबकि तमिलनाडु के नतीजों पर संतोष जाहिर कर टीवीके प्रमुख जोसेफ विजय को जीत की बधाई दी है। कांग्रेस को केरल के चुनाव परिणाम में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई है। चूंकि वहां कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया है।
बंगाल में जीत के बाद क्या BJP इस राज्य में ऑपरेशन लोटस की तैयारी कर रही है, एक वरिष्ठ नेता ने संकेत दिए
देश में पिछले कुछ साल से चुनाव नतीजों पर सवाल उठाए जाने का सिलसिला तेज हो चुका है। कभी ईवीएम और वीवीपैट पर तो कभी चुनाव आयोग व केंद्रीय सुरक्षा बलों की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर पराजित दल अपनी खिसियाहट दूर करने की भरपूर कोशिश करते हैं। अनुभवी राजनेता ममता बनर्जी इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकतीं कि यदि वे इस्तीफा नहीं देतीं तो राज्यपाल उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं या फिर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर सकते हैं। यदि उनके हठ के कारण इसकी नौबत आई तो इससे उनकी फजीहत ही होगी।
स्टालिन और विजयन ने माना जनादेश, तो ममता क्यों बनीं बागी?
रह-रहकर संविधान की दुहाई देने वाली ममता जिस प्रकार इस्तीफा देने से मना कर रही हैं, उसकी मिसाल मिलना कठिन है। तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने अपनी हार सहजता से स्वीकार की और केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने तो ऐसा करने के अलावा अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया। लोकतंत्र में ऐसा ही होना चाहिए, मगर ममता बनर्जी राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय दे रही हैं। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि मतदाता सब कुछ भूल जाते हैं, मगर किसी का अहंकार आसानी से नहीं भूलते।
पश्चिम बंगाल में ममता सिर्फ इसलिए नहीं हारीं, क्योंकि मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो गया और अधिसंख्य हिंदू वोट भाजपा के खाते में चले गए। वे इसलिए भी हारीं, क्योंकि महिला मुख्यमंत्री होने के बाद भी राज्य में महिला असुरक्षा एक प्रमुख मुद्दा बना। उन्हें नैतिक आधार पर इस्तीफा देकर जनता के बीच दोबारा जाना चाहिए।



