इटावा में आवारा बन्दर-कुत्तों का खूनी तांडव
साल भर में 10 हजार लोग हुए लहूलुहान

इटावा। इटावा जनपद में आवारा कुत्तों और बंदरों का आतंक अब एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है। शहर की गलियों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक इन जानवरों के हमलों से दहशत का माहौल है। स्थिति यह है कि जिला अस्पताल के एंटी रैबीज वार्ड में प्रतिदिन पीड़ितों की लंबी कतारें लग रही हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो बीते एक वर्ष में अकेले जिला अस्पताल में ही करीब 10 हजार लोगों को कुत्तों और बंदरों के काटने के कारण इंजेक्शन लगवाना पड़ा है।
रोजाना पहुंच रहे 40 नए मामले
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर संयुक्त जिला अस्पताल की ओपीडी और इमरजेंसी में सुबह से ही घायलों का पहुंचना शुरू हो जाता है। अस्पताल के आंकड़ों के मुताबिक, प्रतिदिन 35 से 40 लोग पहली बार टीका (फर्स्ट डोज) लगवाने पहुंच रहे हैं, जबकि दूसरी और तीसरी डोज मिलाकर यह संख्या प्रतिदिन 90 के पार पहुंच रही है। इनमें सबसे ज्यादा संख्या उन मासूम बच्चों की है,जो घर के बाहर खेलते समय इन जानवरों का आसान शिकार बन रहे हैं।
घर से निकले युवक और मासूम पर हमला
अस्पताल की इमरजेंसी में उपचार कराने आए एक ग्रामीण ने बताया कि उनका बेटा खेत पर खाना देने जा रहा था,तभी कुत्तों के झुंड ने उस पर हमला कर दिया। वहीं, शहर के एक मोहल्ले की तीन साल की मासूम बच्ची को घर के बाहर खेलते समय कुत्ते ने काट लिया। आए दिन हो रही इन घटनाओं से अभिभावक अब बच्चों को अकेले बाहर भेजने से डरने लगे हैं।
प्रजनन काल के कारण बढ़ा चिड़चिड़ापन
अस्पताल की चिकित्सक डॉ. अर्चना सिंह ने बताया कि वर्तमान समय जानवरों का प्रजनन काल है, जिसके कारण उनके व्यवहार में आक्रामकता बढ़ जाती है। उन्होंने सलाह दी कि जानवर के काटने पर घाव को तत्काल साबुन और साफ पानी से 15 मिनट तक धोना चाहिए। इसके बाद बिना समय गवाए चिकित्सक से संपर्क कर एंटी रैबीज का पूरा कोर्स करना चाहिए।
प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
हजारों लोगों के घायल होने के बावजूद नगर पालिका और जिला प्रशासन की ओर से इन जानवरों को पकड़ने या उनकी संख्या नियंत्रित करने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रशासन केवल किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है। आवारा जानवरों की नसबंदी और उनके पुनर्वास की योजनाएं फाइलों में दबी हुई हैं।



