भारत की चिंता बढ़ी! रूसी तेल पर 16 मई को खत्म होने वाली है US की छूट

Russian Oil Imports: 16 मई भारत के लिए एक बेहद अहम तारीख साबित होने वाली है। रूस से कच्चे तेल के आयात पर अमेरिका की ओर से दी गई छूट (waiver) इस हफ़्ते के आखिर में खत्म होने वाली है। अगर इस छूट को आगे नहीं बढ़ाया गया, तो भारत की तेल रिफ़ाइनरियों को रूस से तेल का आयात कम करने पर मजबूर होना पड़ेगा, जिससे देश के अंदर आर्थिक चुनौतियाँ और भी बढ़ सकती हैं।

अमेरिका की चुप्पी और रिफ़ाइनरियों की चिंताएँ

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने अभी तक यह साफ़ नहीं किया है कि 16 मई के बाद भी भारत को रूस से तेल खरीदने की इजाज़त मिलेगी या नहीं। अगर इस छूट को आगे नहीं बढ़ाया गया, तो भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से काफ़ी ज़्यादा कीमतों पर तेल खरीदना पड़ेगा। इस हालात से देश की तेल-प्रोसेसिंग कंपनियों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ सकता है।

आँकड़े क्या बताते हैं?

Kpler के डेटा के मुताबिक, मई महीने में अब तक भारत ने रूस से औसतन हर दिन 2.3 मिलियन बैरल तेल का आयात किया है—जो एक नया रिकॉर्ड है। अमेरिका की ओर से पहले दी गई छूट की वजह से उस तेल का आयात मुमकिन हो पाया, जो पहले ही टैंकरों में लोड हो चुका था। हालाँकि, अगर रूस से भारत के लिए कोई नई खेप रवाना नहीं होती है, तो हर दिन होने वाले इस आयात की मात्रा घटकर 1.9 मिलियन बैरल तक पहुँच सकती है।

ईरान विवाद की दोहरी मार

ईरान से जुड़े विवाद ने पहले ही दुनिया के तेल बाज़ार में भारी उथल-पुथल मचा दी है। इस विवाद की वजह से फ़ारस की खाड़ी (Persian Gulf) के इलाके से होने वाली तेल की सप्लाई में रुकावट आ गई है। चूँकि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है, इसलिए दुनिया भर में हो रहे इन भू-राजनीतिक बदलावों का भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा और तुरंत असर पड़ रहा है।

भारतीय कंपनियों की आपातकालीन तैयारियाँ

हालात की गंभीरता को समझते हुए, रिपोर्टों से पता चलता है कि भारत की बड़ी सरकारी कंपनियाँ—जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) और भारत पेट्रोलियम (BPCL)—अब तेल आयात के लिए दूसरे विकल्पों की तलाश में जुट गई हैं। इन कंपनियों ने हाल ही में पश्चिमी अफ़्रीका और अमेरिका से कच्चा तेल खरीदा है। इसके अलावा, फ़ारस की खाड़ी के इलाके पर अपनी निर्भरता कम करने के मकसद से, BPCL ने अज़रबैजान और अफ़्रीका के कई देशों के साथ तेल की छोटी अवधि की सप्लाई के समझौतों पर बातचीत शुरू कर दी है।

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ये प्रतिबंध यूक्रेन संघर्ष की पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा रूस पर लगाए गए थे, जिनका उद्देश्य उस देश पर दबाव डालना था। नतीजतन, पूरा भारतीय तेल क्षेत्र अब बड़ी बारीकी से यह देख रहा है कि 16 मई के बाद अमेरिका क्या रुख अपनाता है। इस बीच, न तो मंत्रालय और न ही संबंधित कंपनियों ने अब तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान जारी किया है।

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