पाकिस्तान की शामत आई, तालिबान के खूनी पलटवार ने उड़ा दी जिन्ना के देश की नींद

दुनिया में जंग के नए-नए मोर्चे खुल रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से इतर पाकिस्तान-अफगानिस्तान अचानक आपस में भिड़ गए हैं। गोलीबारी व बमबारी की शुरुआत से दोनों तरफ तनाव चरम पर है। दोनों पड़ोसियों का विवाद शांत कराने के लिए चीन, रूस व ईरान ने मध्यस्थता की पेशकश कर दी है। जंग न थमने पर दोनों मुल्कों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान की माली हालत खराब है। यह दोनों देश दूसरे मुल्कों के रहमो-करम पर अपना गुजारा करने को मजबूर हैं। अफगानिस्तान में फिलवक्त तालिबान की सरकार है। जिसके साथ पाकिस्तान की सेना व सरकार के रिश्ते अच्छे नहीं हैं। पहले भी दोनों पक्षों में खूनी संघर्ष देखने को मिल चुका है, मगर इस बार तालिबान ने जिस ताकत के साथ पलटवार किया है, उसने पाकिस्तान की नींद उड़ाकर रख दी है। तालिबानी लड़ाके न थकते हैं, ना मरने से डरते हैं।

तालिबान से भिड़ना आसान नहीं

दुश्मन को मात देने की खातिर वह किसी भी हद तक जाने को हमेशा तैयार रहते हैं। जिस तालिबान को रूस और अमेरिका जैसे ताकतवर देश लंबे संघर्ष के बावजूद घुटनों पर लाने में कामयाब नहीं हो पाए, उसे पाकिस्तान कैसे परास्त कर पाएगा, ये सवाल महत्वपूर्ण है। जानकारों का मानना है कि अफगानिस्तान की सबसे बड़ी पावर उसकी भौगोलिक स्थिति है। दुर्गम पहाड़ों से घिरे अफगानिस्तान में सैन्य कार्रवाई करना बेहद मुश्किल काम है। पाकिस्तान के पास बेशक ताकतवर एयर फोर्स हो, मगर थल सेना को अफगानिस्तान में भेजना और ऑपरेशन करना लगभग असंभव है।

तालिबान के पास एक लाख से ज्यादा लड़ाके और दस लाख छोटे हथियार हैं। इसके अलावा कई हजार बख्तरबंद गाड़ियां भी हैं। एंटी एयरक्राफ्ट गन तथा अमेरिका के सपोर्ट वाली पुरानी अफगान नेशनल आर्मी से जब्त किया गया हथियारों का भंडार है। तालिबान लड़ाकों के पास अमेरिका में निर्मित राइफलों के अलावा भारी मशीन गन्स भी हैं।

अफगानिस्तान की सीमा पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत से मिलती है। सीमा के दोनों ओर पश्तून नस्ल के नागरिक रहते हैं। ये कबीले एक-दूसरे को भाई मानते हैं और एक-दूसरे के क्षेत्रों में आसानी से आते-जाते रहते हैं। काबुल पर हमले के बाद पाकिस्तान के लिए अपना घर संभालना भी अब मुश्किल हो सकता है। इस क्षेत्र में पहले से ही टीटीपी ने पाकिस्तानी सेना की नाक में दम कर रखा है। तालिबान को गुरिल्ला लड़ाई में महारत हासिल है। पहले सोवित संघ और फिर अमेरिका के खिलाफ तालिबान ने बीस साल से भी अधिक समय तक लड़ाई लड़ी है।

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अफगान लड़ाके मुश्किल क्षेत्र और मुश्किल परिस्थितियों में भी टिके रहने के लिए जाने जाते हैं। आत्मघाती हमलावरों का प्रयोग तालिबान सबसे ताकतवर हथियार के रूप में करता है। अफगानिस्तान की चुनौती से इतर पाकिस्तान पहले से घरेलू मोर्चे पर अनेक चुनौतियों का सामना करने को मजबूर है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तून में सेना व पुलिस को जन विरोध झेलना पड़ रहा है।

पिछले साल भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए पाकिस्तान की कमर तोड़कर रख दी थी। उस दर्द से अब तक वह उबर नहीं पाया है। तालिबान के साथ लड़ाई लंबी खींचने पर पाकिस्तान की हालत और पतली होना तय है। उधर, अमेरिका-ईरान के मध्य भी टेंशन हाई लेवल पर है। अमेरिका किसी भी समय ईरान पर बड़ा हमला कर सकता है। इस स्थिति में ईरान को पाकिस्तान का सपोर्ट मिलना मुश्किल हो जाएगा।

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