सत्यशोधक समाज की स्थापना दिवस पर राष्ट्रीय विचार मंथन का आयोजन

स्टार एक्सप्रेस संवाददाता
लखनऊ/नई दिल्ली. सामाजिक संगठन अम्बेडकरी महिला मंच द्वारा सत्यशोधक समाज की स्थापना दिवस पर बीते 24 सितंबर 2026 को एक गूगल मीट पर राष्ट्रीय विचार मंथन का आयोजन किया गया। संगठन की महासचिव और कार्यक्रम की संचालिका के रूप में शालिनी ने सभी का स्वागत करते हुए कहा कि सत्यशोधक समाज की स्थापना 24 सितंबर 1873 को ज्योतिबा फूले ने की थी। लेकिन अपने उद्देश्यों के कारण यह संस्था से परिवर्तित होकर 19वीं सदी का एक क्रांतिकारी सामाजिक आंदोलन बन गया जिसका मूल उद्देश्य सत्य की खोज, जातिगत और लैंगिक समानता और समाज को ब्राह्मणवादी धार्मिक वर्चस्व से मुक्त करना था।
लेकिन यदि आज के संदर्भों में देखें तो इतने सशक्त सामाजिक आंदोलन के बावजूद जमुई बिहार की घटना दिखाती है कि समाज में लैंगिक असमानता की खाई कितनी गहरी है, शिक्षण संस्थानों में दलित बच्चों की आत्महत्या देखकर लगता है कि ये सशक्त आंदोलन जैसे अब विलुप्त हो गया है इसलिए हमें इसके कारणों पर भी चर्चा करनी होगी।
पहले वक्ता के रूप में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं संतोष इंदौरा ने बताया कि सत्यशोधक आंदोलन का मुख्य उद्देश्य शूद्रों-अतिशूद्रों व महिलाओं को सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक शोषण से मुक्ति दिलाना था। ब्राह्मण वर्चस्व से मुक्ति दिलाने के लिए ज्योतिबा फूले की सत्यशोधक विवाह पद्धति सादी और सुधारवादी विवाह पद्धति है जिसे आज भी पूरी तरह से कानूनी मान्यता प्राप्त है। यह बिना पुरोहित, बिना दहेज और स्त्री-पुरुष की समानता पर आधारित विवाह पद्धति है। भारतीय संविधान में निहित सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता और आरक्षण नीतियाँ , जिसकी शुरुआत शाहू जी महाराज ने सत्यशोधक आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए की थी, काफी हद तक इसी विचारधारा से प्रभावित है।
विशिष्ठ वक्ता के रूप में प्रो. सुभाष सैनी ने बताया कि सत्यशोधक आंदोलन विलुप्त नहीं हुआ है। आज हम जो अलग-अलग राज्यों से एक विचार के माध्यम से जुड़े हैं और अपनी सारी शक्ति व बौद्धिकता के साथ आगे बढ़ रहे हैं यह साबित करता है कि आज सत्यशोधक आंदोलन का स्वरूप बदल गया है और ये पहले से अधिक व्यापक हो गया है। किसानों का भूमि सुधार आंदोलन इसी आंदोलन से निकलकर आया है। आज शूद्रों-अतिशूद्रों के अंदर समानता और सम्मान की जो इच्छा जागी है वो इसी आंदोलन के कारण है।
आगे प्रो. सैनी ने बताया कि पूना से इस आंदोलन की शुरूआत ऐतिहासिक महत्व रखती है क्योंकि मध्यकाल में बनारस और आधुनिक काल में पुणे बहुजनों के शोषण का गढ़ रहा है। आज सभी राजनीतिक पार्टीयों में भी बहुजनों के मुद्दे केंद्र में हैं जो दिखाता है कि आज भी अलग स्वरूप के साथ आंदोलन आगे बढ़ रहा है। वे सुझाव देते हैं कि अम्बेडकरी महिला मंच जैसे अन्य संगठनों को एकजुट होकर समाज के लिए पंचवर्षीय योजनाओं की तैयारी भी करनी चाहिए।
मुख्य वक्ता के तौर पर प्रो. नूतन मालवी ने बताया कि वे सत्यशोधक महिला प्रबोधिनी के तौर पर गाँव-गाँव जाकर महिलाओं के बीच काम करती हैं। इसलिए वे जानती हैं कि महिलाओं की इस तरह मानसिक कंडीशनिंग की गई है कि वे स्त्रियों व पुरुषों के लिए अलग सामाजिक नियमों को सहजता से स्वीकार कर लेती हैं जैसे बाल विवाह, सती प्रथा आदि इसके उदाहरण हैं।
इनके अतिरिक्त ज्योति रावत, सुमित्रा रावत ने भी अपने विचार रखे। अंत में सरला ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा कि सभी वक्ताओं ने नई जानकारियों से हमें लाभान्वित किया। किसी भी आंदोलन को आगे ले जाने के लिए शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है। जिस प्रकार एवरेस्ट पर फतेह करने के लिए पहला कदम उठाना ज़रूरी है वैसे ही समाज को जागृत करने के लिए शिक्षा पहला कदम है।
इस चर्चा में देश भर से महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार आदि राज्यों से लोगो ने भाग लिया। कार्यक्रम की खासियत इसमें बड़े पैमाने पर महिलाओं का जुड़ना था।



