‘शूल’ के समर जैसी है डॉ यशवीर सिंह की कार्यशैली

आरोपी कोई भी हो तत्काल कार्यवाही करते हैं कप्तान साहब

अनुभव स्वरूप यादव
वरिष्ठ संवाददाता

रायबरेली। सिनेमा भी एक तरह का साहित्य होता है और माना यह जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। लेकिन देखा जाए तो सिनेमा हो या साहित्य दोनों का समाज से पारस्परिक सम्बन्ध होता है और ये तीनों एक दूसरे के पूरक होते हैं।

1999 में राम गोपाल वर्मा ने एक फ़िल्म बनायी थी जिसका नाम था “शूल”।

इसी फ़िल्म से पहली बार सिनेमा जगत के दिग्गज अभिनेता मनोज बाजपेई ने हीरो के तौर पर अपने करियर की शुरूआत की थी। फ़िल्म की कहानी एक ईमानदार और कर्त्यव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी समर प्रताप सिंह की है जो समाज में व्याप्त अपराध और विभाग में फैली विसंगतियों के खिलाफ संघर्ष करता है। फ़िल्म में एक सीन है जिसमें समर प्रताप सिंह अपने उस सिपाही के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए अडिग हो जाते हैं जो ड्यूटी के दौरान अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं करता है जबकि कई साथी पुलिस कर्मी समर प्रताप सिंह से निवेदन करते है कि विभाग का मामला है, कार्यवाही ना करें, डांट-डपट कर छोड़ दें लेकिन फिर भी समर प्रताप सिंह उसके खिलाफ कार्यवाही करते हैं।

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जनपद में हुए दो घटनाक्रमों को अगर देखा जाए तो रायबरेली पुलिस अधीक्षक डॉ यशवीर सिंह की कार्यशैली भी “शूल” फ़िल्म के इस दृश्य के बिलकुल समानान्तर है। अक्टूबर महीने की शुरुआत में ऊंचाहार थाना क्षेत्र में एक मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति को ग्रामीणों द्वारा पीट-पीट कर मार डाले जाने के मामले में पुलिस अधीक्षक डॉ यशवीर सिंह ने जितनी कड़ी कार्यवाही दोषियों के खिलाफ की है उतनी ही कड़ी कार्यवाही अपने विभाग के उन अधिकारियों के खिलाफ भी की है जिनकी गैर जिम्मेदाराना कार्यशैली के चलते यह घटना हुई थी। इसी तरह ऊंचाहार क्षेत्र की ही एक महिला द्वारा जब यह आरोप लगाया गया कि एसओजी प्रभारी द्वारा उसके पति को पकड़ने के बाद तीन लाख रूपये की वसूली की गयी तब भी कप्तान साहब ने आरोपी एसओजी प्रभारी को तत्काल हटा कर दूसरी शाखा में भेज दिया।

दोषी चाहे कोई अपराधी हो या कोई आम आदमी या फिर खुद पुलिस विभाग का कोई कर्मचारी हो डॉ यशवीर सिंह ने कार्यवाही करने में ना तो कोई संकोच किया और ना ही देरी। यही कार्यशैली जनता के मन में उनके और विभाग के प्रति विश्वास पैदा करती है और कहीं ना कहीं शासन के भरोसे को भी क़ायम रखती है। बात फ़िल्मी हो यह जरूरी नहीं है लेकिन कार्यशैली ऐसी हो जिसमें जनता को पोएटिक जस्टिस मिलता रहे और जिसमें अभी तक के कार्यकाल में डॉ यशवीर सिंह खरे उतरे हैं।

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