मेरा टेसू यहीं अड़ा-खाने को मांगे दही बड़ा

मेरी झेंझी को रचो है ब्याह-ब्याह को दहेज देव

जसवंतनगर,इटावा। विजयेंद्र तिमोरी,भारतीय पंचांग में दर्ज तिथियां केवल त्योहारों का संकेत नहीं देतीं, बल्कि उनसे जुड़ी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखती हैं। ब्रज क्षेत्र में ऐसी ही अनूठी परंपरा है टेसू-झेंझी विवाह की। शरद नवरात्र की नवमी से शरद पूर्णिमा तक किशोर-किशोरियां टेसू और झेंझी लेकर घर-घर जाते हैं और पारंपरिक लोकगीत गाकर रुपये व पुरस्कार जुटाते हैं। शरद पूर्णिमा की रात इन्हीं पैसों से टेसू-झेंझी का विवाह कराया जाता है।

इटावा ब्रज क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण जसवंतनगर,भरथना और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी देखने को मिलती है। शाम ढलते ही किशोर-किशोरियों की टोलियां टेसू और झेंझी लेकर घरों की चौखट पर पहुंचती हैं। यहां वे लोकगीत सुनाते हैं। सबसे अधिक प्रचलित गीत हैं-‘मेरा टेसू यहीं अड़ा,खाने को मांगे दही बड़ा।’ इसके अलावा ‘मेरी झेंझी को रचो है ब्याह, ब्याह को दहेज देव’ और ‘टेसू अटर करें, टेसू बटर करें, टेसू लेई के टरे’ जैसे गीत भी गूंजते हैं।

मिट्टी के टेसू और झेंझी की अलग पहचान

टेसू मिट्टी से बना तीन टांग वाला दूल्हा होता है। तीन लकड़ियों के ढांचे पर उसका धड़ रखा जाता है और ऊपर दीपक जलाया जाता है। वहीं झेंझी मिट्टी की मटकी होती है, जिसमें चारों ओर छोटे-छोटे छेद होते हैं। इसके भीतर दीपक जलने पर छेदों से निकलने वाली रोशनी झेंझी को आकर्षक बना देती है।

बच्चों से गीत सुनने के बाद लोग उन्हें रुपये देते हैं। कई गांवों में इन रुपयों को जोड़कर शरद पूर्णिमा को बाकायदा विवाह समारोह आयोजित किया जाता है। कहीं-कहीं शादी के कार्ड छपवाने, बैंड-बाजे,आतिशबाजी और नृत्य के साथ टेसू की बारात निकालने की परंपरा भी है। द्वारचार, झेंझी की पैर पूजाई और कन्यादान जैसी रस्में भी निभाई जाती हैं।

सात फेरे पूरे होने से पहले ही टूट जाता है विवाह

इस परंपरा की सबसे मार्मिक रस्म विवाह का अधूरा रह जाना है। मान्यता के अनुसार सात फेरे पूरे होने से पहले टेसू का सिर धड़ से अलग कर दिया जाता है और झेंझी को फोड़ दिया जाता है। इसके बाद दोनों को नदी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है।

महाभारत काल से जुड़ी है मान्यता

लोक मान्यता के अनुसार टेसू-झेंझी की कथा महाभारत काल से जुड़ी है। इटावा के चकरनगर क्षेत्र को प्राचीन समय में चक्रनगरी कहा जाता था। मान्यता है कि पांडवों ने अज्ञातवास का समय यहां बिताया था। इसी कथा में भीम और हिडिंबा के पुत्र घटोत्कच तथा उनके पुत्र बर्बरीक का उल्लेख मिलता है। बर्बरीक को ही टेसू के रूप में माना जाता है।

कहा जाता है कि बर्बरीक को एक ब्राह्मण कन्या से प्रेम हो गया था, लेकिन कन्या के पिता ने सामाजिक कारणों से विवाह का विरोध किया। कई बार विवाह टालने के प्रयास हुए। अंततः पूर्णिमा के दिन संघर्ष हुआ और बर्बरीक यमुना में कूद गया। लोककथा में इसी अधूरी प्रेमकथा को टेसू-झेंझी विवाह की परंपरा से जोड़ा जाता है।

ग्रामीण अंचल में अब भी कायम है परंपरा

बदलते समय में शहरों में यह परंपरा लगभग सिमट गई है,जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की टोलियां आज भी इसे जीवित रखे हुए हैं। बुजुर्गों का कहना है कि कभी कस्बों के उन मोहल्लों में भी टेसू-झेंझी विवाह खूब होता था, जहां मिट्टी के आंगन, चूल्हे और ग्रामीण जीवन की सहजता दिखाई देती थी। अब यह परंपरा मुख्य रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से साधारण परिवारों के बच्चों के प्रयासों से आगे बढ़ रही है। लोक मान्यता है कि टेसू-झेंझी का विवाह होने के बाद ही सहालग शुरू होता है। जिनके विवाह में अड़चन आती है,वे भी टेसू-झेंझी विवाह कराने को शुभ मानते हैं।

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