2,000 रुपये से ऊपर के UPI पेमेंट पर चार्ज; दिवाली से पहले आया वो फैसला, जिसे सुनकर खुशी से झूम उठेंगे ग्राहक

NPCI Defers UPI MDR Charge: त्योहारी सीजन की खरीदारी के बीच डिजिटल लेनदेन करने वाले करोड़ों ग्राहकों और व्यापारियों के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। देश में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI का संचालन करने वाली संस्था नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के अपने फैसले को फिलहाल टाल दिया है।

यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी की अहम बैठक में यह तय किया गया कि फेस्टिव सीजन में बाजार की गतिविधियों और त्योहारी सेल के महत्व को देखते हुए चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन पर इस शुल्क को नवंबर के दूसरे हफ्ते यानी दिवाली के बाद ही प्रभावी किया जाएगा। इसके लागू होने की सटीक तारीख का ऐलान बाद में अलग से होगा, जबकि इसे जनवरी 2027 तक आगे खिसकाने के विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार चल रहा है।

यह कदम ऐसे वक्त में उठाया गया है जब तमाम व्यापारी संगठनों, फिनटेक स्टार्टअप्स और प्रमुख पेमेंट एग्रीगेटर्स ने इस फैसले को कुछ समय के लिए रोकने की पुरजोर मांग की थी। दरअसल, यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी ने 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट पेमेंट्स पर 0.4 प्रतिशत यानी 40 बेसिस पॉइंट का MDR लगाने का प्रस्ताव रखा था। इसका सीधा गणित यह है कि 2,000 रुपये के लेनदेन पर 8 रुपये और 10,000 रुपये के भुगतान पर 40 रुपये का चार्ज बनता है।

मर्चेंट संगठनों का तर्क था कि दिवाली और धनतेरस जैसी मेगा सेल के दौरान नई फीस लागू होने से भ्रम की स्थिति बनेगी। वहीं सरकार और नीति निर्माताओं को भी यह चिंता सता रही थी कि महंगाई के दौर में कारोबारी इस अतिरिक्त लागत का बोझ अप्रत्यक्ष रूप से आम खरीदारों की जेब पर डाल सकते हैं। वित्त मंत्री ने भी पहले ही साफ कर दिया था कि MDR का मामला पूरी तरह स्टेकहोल्डर्स और पेमेंट इकोसिस्टम के विवेक पर निर्भर करेगा।

क्रेडिट या डेबिट कार्ड के मुकाबले देश में UPI का दायरा काफी बड़ा और जटिल है। भारत में जहां स्वाइप कार्ड मशीनें करीब 1.1 करोड़ टर्मिनलों तक सीमित हैं, वहीं UPI क्यूआर कोड गांव-देहात के छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े मॉल तक 10 करोड़ से ज्यादा व्यापारियों की दैनिक जीवनरेखा बन चुका है।

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कार्ड नेटवर्क में ज्यादातर पेमेंट्स के लिए दरें लगभग एक जैसी होती हैं, जबकि UPI में यूटिलिटी बिल, लोन की किस्तें, बीमा प्रीमियम और कैपिटल मार्केट निवेश जैसी अलग-अलग श्रेणियों के लिए अलग व्यवस्था तय की गई है। इनमें से कई ट्रांजैक्शन ऐसे हैं जो नियामक नियमों के चलते क्रेडिट कार्ड से किए ही नहीं जा सकते और पहले नेट बैंकिंग, NEFT या IMPS के जरिए पूरे होते थे। UPI की इसी व्यापक पहुंच और आम जनता पर इसके प्रभाव को देखते हुए उद्योग जगत एक संतुलित, पारदर्शी और फ्लैट फीस मॉडल तैयार करने की मांग कर रहा है ताकि डिजिटल इंडिया की रफ्तार धीमी न पड़े।

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