क्या भारत में भी नेपाल-बांग्लादेश जैसी अस्थिरता की तैयारी, विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों पर गहराया सियासी घमासान

India political unrest debate: देश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में विरोध प्रदर्शनों, विपक्षी लामबंदी और कथित अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों और सत्तारूढ़ खेमे की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या देश के भीतर पड़ोसी देशों जैसे हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है। नेपाल और बांग्लादेश में हाल के वर्षों में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों का हवाला देते हुए आरोप लगाए जा रहे हैं कि युवाओं और जनआंदोलनों की आड़ में सत्ता परिवर्तन के मॉडल को दोहराने की रणनीति बनाई जा रही है।
मंचों की साझा राजनीति और चर्चित चेहरों की बयानबाजी
राजधानी दिल्ली से लेकर राज्यों तक सरकार विरोधी माहौल बनाने के आरोपों के केंद्र में विभिन्न विपक्षी दल और नागरिक संगठन हैं। अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, प्रकाश राज और यूट्यूबर ध्रुव राठी जैसे चर्चित चेहरों की हालिया सक्रियता ने इस बहस को और हवा दे दी है। आलोचकों का तर्क है कि यह खेमा सरकार और संवैधानिक संस्थाओं, जैसे चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त, पर लगातार सवाल उठाकर संस्थागत विश्वसनीयता को चोट पहुंचा रहा है। वहीं, बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ध्रुव राठी द्वारा फंडिंग और नारों को लेकर दिए गए बयानों ने भी सियासी हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है।
घटनाओं पर चयनात्मक चुप्पी के आरोप
राजनीतिक बहसों में चयनात्मक रुख अपनाने के आरोप भी सामने आ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि फ्लाईदुबई विमान हादसे में घायल भारतीय पायलट स्मित मच्छार की बहादुरी जैसे राष्ट्रीय गौरव के मुद्दों पर प्रमुख विपक्षी नेताओं और संबंधित हस्तियों ने चुप्पी साधे रखी, जबकि चुनावी प्रक्रियाओं और एसआईआर (SIR) व्यवस्था को लेकर आक्रामक रुख अपनाया जा रहा है। इसी बीच, दिल्ली में एक कश्मीरी युवक के साथ कथित मारपीट की घटना ने भी ध्यान खींचा, जहां पीड़ित ने घाटी में आए सकारात्मक बदलावों और शांति का समर्थन करते हुए उपद्रव फैलाने की कोशिशों का विरोध किया।
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राजधानी में प्रदर्शन और प्रशासनिक रुख
दिल्ली में अनुमति न मिलने के बावजूद विरोध प्रदर्शन करने की जिद को लेकर भी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। सत्तापक्ष और सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि संवेदनशील माहौल में अनधिकृत प्रदर्शनों का मकसद शांति व्यवस्था को प्रभावित करना हो सकता है। दूसरी तरफ, विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की अभिव्यक्ति बता रहा है। इन तमाम सियासी उठापटक और तीखे आरोपों के बीच आम जनता पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है।



