फोन के ज्यादा इस्तेमाल से बच्चों में बढ़ रही ये 6 बीमारियां, आज ही बदलें आदत

Negative Effects Of Mobile On Children: आज के डिजिटल दौर में नन्हे-मुन्ने बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन दिखना एक बेहद आम बात बन चुकी है। ऑनलाइन पढ़ाई, कार्टून देखने से लेकर गेमिंग तक के लिए बच्चे स्क्रीन पर निर्भर होते जा रहे हैं। लेकिन चिंता तब गंभीर हो जाती है जब बच्चे घंटों तक फोन से नजरें नहीं हटाते। आधुनिक पेरेंटिंग में यह सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है कि बच्चों का स्क्रीन एडिक्शन कैसे छुड़ाया जाए।
अत्यधिक स्क्रीन टाइम न सिर्फ बच्चों के मानसिक विकास और व्यवहार पर चोट करता है बल्कि उनके शारीरिक स्वास्थ्य को भी खोखला कर रहा है। आयुर्वेद कंसल्टेंट डॉ. अमरजीत ने सोशल मीडिया के माध्यम से बच्चों में बढ़ते स्क्रीन टाइम के कई खतरनाक दुष्प्रभावों को साझा किया है, जिन्हें हर माता-पिता को गंभीरता से समझना चाहिए।
आंखों की रोशनी पर पड़ता है सीधा दबाव, बढ़ रहा है आई-स्ट्रेन
छोटे बच्चों का लगातार घंटों तक चमकीली मोबाइल स्क्रीन पर टकटकी लगाए रहना उनकी नाजुक आंखों के लिए भारी संकट बन रहा है। इससे आंखों की मांसपेशियों पर लगातार खिंचाव बना रहता है, जिसके चलते कम उम्र में ही आंखों में सूखापन, जलन, थकान और दृष्टि कमजोर होने लगती है। विशेषज्ञों की राय है कि बच्चों के स्क्रीन टाइम की सख्त सीमा तय की जाए और उन्हें हर 20-30 मिनट बाद स्क्रीन से नजरें हटाकर दूर देखने व पलकें झपकाने की आदत सिखाई जाए ताकि आंखों को आराम मिल सके।
सिरदर्द और माइग्रेन की गिरफ्त में आ रहे हैं मासूम
मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों में लगातार सिरदर्द की समस्या को जन्म दे रहा है। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी और आंखों पर पड़ने वाला अत्यधिक दबाव सीधे नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है, जिससे सिर में तेज खिंचाव और दर्द की शिकायत होने लगती है। संवेदनशील बच्चों में यह समस्या आगे चलकर कम उम्र में ही माइग्रेन का रूप ले सकती है। यदि बच्चा फोन चलाने के बाद बार-बार सिरदर्द या भारीपन की शिकायत करे, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत उसकी स्क्रीन की आदत पर ब्रेक लगाएं।
कमजोर याददाश्त और पढ़ाई में एकाग्रता का अभाव
डॉक्टर के अनुसार रील्स, शॉर्ट्स और तेज गति वाले वीडियो गेम देखने से बच्चों का दिमाग ओवर-स्टिम्युलेट हो जाता है। इसके चलते उनकी एकाग्रता अवधि (अटेंशन स्पैन) तेजी से घटने लगती है। लंबे समय तक स्क्रीन में डूबे रहने वाले बच्चे जब पढ़ाई करने या कोई रचनात्मक काम करने बैठते हैं, तो उनका ध्यान एक जगह टिक नहीं पाता और याददाश्त भी कमजोर होने लगती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को डिजिटल दुनिया से बाहर निकालकर मैदानी खेलों, पहेलियों और किताबों से जोड़ें।
‘टेक्स्ट नेक’ सिंड्रोम: गर्दन और रीढ़ की हड्डी में गंभीर दर्द
फोन चलाते समय बच्चे अक्सर घंटों तक गलत पोस्चर में गर्दन झुकाकर बैठे रहते हैं। लगातार नीचे की ओर झुकी हुई गर्दन और मुड़ी हुई पीठ से रीढ़ की हड्डी पर असामान्य भार पड़ता है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘टेक्स्ट नेक’ सिंड्रोम कहा जाता है। इससे बच्चों की गर्दन, कंधों और रीढ़ के जोड़ों में अकड़न व तेज दर्द की शिकायत होने लगती है। अभिभावकों को बच्चों के बैठने के पोस्चर पर पैनी नजर रखनी चाहिए और उन्हें लंबे समय तक एक ही मुद्रा में झुककर बैठने से टोकना चाहिए।
स्लीप साइकिल हो रही है तबाह, अनिद्रा और बेचैनी की समस्या
रात को बिस्तर पर जाने के बाद भी फोन में लगे रहना बच्चों की प्राकृतिक स्लीप साइकिल को पूरी तरह तहस-नहस कर देता है। स्क्रीन की रोशनी शरीर में नींद लाने वाले जरूरी मेलाटोनिन हार्मोन के स्राव को बाधित कर देती है, जिससे दिमाग लगातार उत्तेजित रहता है और बिस्तर पर लेटने के बावजूद घंटों तक नींद नहीं आती। पर्याप्त और गहरी नींद न मिलने से अगले दिन बच्चे थके, सुस्त और ऊर्जाहीन महसूस करते हैं। नियम बनाएं कि सोने से कम से कम एक घंटा पहले घर में सभी स्क्रीन पूरी तरह बंद कर दी जाएं।
अनार को डाइट में शामिल करने से मिल सकते हैं ये फायदे, जानें खाने का सही तरीका
व्यवहार में चिड़चिड़ापन, जिद्दीपन और तनाव के लक्षण
स्मार्टफोन की लत बच्चों के भावनात्मक संतुलन को भी बिगाड़ देती है। जरूरत से ज्यादा फोन चलाने वाले बच्चों के व्यवहार में अचानक गुस्सा, आक्रामकता और चिड़चिड़ापन देखने को मिलता है। जैसे ही माता-पिता उनके हाथ से फोन लेते हैं, वे जोर-जोर से रोने, चीखने या सामान फेंकने जैसी जिद्दी प्रतिक्रियाएं देते हैं। ऐसे समय में बच्चों को डांटने या मारने के बजाय धैर्य से काम लें और धीरे-धीरे दैनिक गतिविधियों व खेलकूद के जरिए स्क्रीन की आदत को नियंत्रित करें।



