सूक्ष्मजीव आधारित खेती पर राष्ट्रीय कार्यशाला सफल, वैज्ञानिकों–उद्योग ने मिलकर खोजे समाधान

मऊ। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो (NBAIM) में 18–19 मार्च को “सूक्ष्मजीव शोध एवं सूक्ष्मजीव आधारित उत्पादों के उत्पादन और विपणन में उद्योग की भूमिका” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का सफल आयोजन हुआ। इस कार्यशाला में देशभर से आए वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, उद्योग प्रतिनिधियों और शोध छात्रों सहित करीब 350 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य खेती में सूक्ष्मजीवों (माइक्रोऑर्गेनिज़्म) के बढ़ते महत्व, उनके वैज्ञानिक उपयोग, नई तकनीकों के विकास और उद्योग के सहयोग से इन उत्पादों को किसानों तक पहुंचाने के तरीकों पर चर्चा करना था।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. विजेंद्र सिंह (कुलपति, डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, अयोध्या) ने वर्चुअल संबोधन में कहा कि आज भारतीय कृषि कई चुनौतियों से जूझ रही है—मिट्टी की उर्वरता में कमी, रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता, जलवायु परिवर्तन और लागत में वृद्धि। उन्होंने बताया कि इन समस्याओं का समाधान सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों में छिपा है, जो मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने, पौधों की वृद्धि बढ़ाने और रोग नियंत्रण में मददगार हैं। उन्होंने वैज्ञानिकों और उद्योगों से सस्ती व प्रभावी तकनीक विकसित करने की अपील की।
विशिष्ट अतिथि डॉ. पी. के. चक्रवर्ती (पूर्व सहायक महानिदेशक, पादप सुरक्षा) ने कहा कि टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती के लिए सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों का उपयोग बेहद जरूरी है। उन्होंने इस क्षेत्र में स्पष्ट नीतियां और गुणवत्ता मानक तय करने पर जोर दिया, ताकि किसानों को भरोसेमंद उत्पाद मिल सकें।
NBAIM के निदेशक डॉ. आलोक कुमार श्रीवास्तव ने स्वागत भाषण में बताया कि संस्थान ने कई तरह के सूक्ष्मजीव आधारित उत्पाद विकसित किए हैं, जिन्हें जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक और जैव उत्प्रेरक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। ये उत्पाद न सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि खेती की लागत घटाते हैं और उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ाते हैं।
कार्यशाला के संयोजक एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. हर्षवर्धन सिंह ने कहा कि बढ़ती आबादी और घटती कृषि भूमि के बीच उत्पादन बढ़ाना बड़ी चुनौती है। ऐसे में रासायनिक खेती पर पूरी तरह निर्भर रहना संभव नहीं है। सूक्ष्मजीव आधारित खेती एक मजबूत और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है।
छह तकनीकी सत्रों में गहन चर्चा
कार्यशाला में छह तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें देश के प्रमुख वैज्ञानिकों ने अपने विचार रखे।
पहला सत्र: सूक्ष्मजीवों की जैव विविधता और खेती में उपयोग—बताया गया कि बैक्टीरिया, फफूंद आदि मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं।
दूसरा सत्र: जैव उर्वरकों का विकास और बड़े पैमाने पर उत्पादन।
तीसरा सत्र: जैव कीटनाशकों का महत्व—रासायनिक दवाओं के सुरक्षित विकल्प के रूप में।
चौथा सत्र: उत्पादों की गुणवत्ता और मानकीकरण की आवश्यकता।
पांचवां सत्र: उद्योग की भूमिका और बाजार की संभावनाएं—बढ़ती मांग पर जोर।
छठा सत्र: नीति निर्माण और भविष्य की रणनीति—सरकार, वैज्ञानिक और उद्योग के समन्वय की जरूरत।
कार्यक्रम के दौरान तकनीकी प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें सूक्ष्मजीव आधारित उत्पादों का प्रदर्शन किया गया और उनके उपयोग की जानकारी दी गई।
किसानों के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
विशेषज्ञों के अनुसार, सूक्ष्मजीव आधारित उत्पाद:
•मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं
•रासायनिक खाद और दवाओं पर निर्भरता कम करते हैं
•उत्पादन लागत घटाते हैं
•फसल की गुणवत्ता सुधारते हैं
•पर्यावरण को सुरक्षित रखते हैं



