भारत की भूली-बिसरी नारीवादी आवाज़ें: जिनके साहस ने बदली समाज की सोच

जाह्नवी शिशोदिया
8 मार्च को पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिन महिलाओं के अधिकारों, उनके संघर्षों और उपलब्धियों को सम्मान देने का अवसर है। यह हमें उन आंदोलनों की याद दिलाता है जिन्होंने महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के लिए लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी। हालांकि अक्सर देखा जाता है कि 8 मार्च के बाद इन मुद्दों पर चर्चा धीरे-धीरे कम हो जाती है और समाज फिर से उसी पितृसत्तात्मक ढांचे में लौट जाता है, जिसे बदलने के लिए ये आंदोलन शुरू हुए थे।
भारत में महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक सुधार की बात होती है तो अक्सर राजा राम मोहन राय, डॉ. भीमराव अंबेडकर, ज्योतिराव फुले और ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे महान समाज सुधारकों का उल्लेख किया जाता है। इन सभी ने महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ महत्वपूर्ण कार्य किए। उनके प्रयासों ने समाज में परिवर्तन की मजबूत नींव रखी। लेकिन इन चर्चाओं के बीच कई ऐसी महिलाओं के नाम पीछे छूट जाते हैं जिन्होंने स्वयं सामाजिक बाधाओं को चुनौती दी और पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाई। सावित्रीबाई फुले, पंडिता रमाबाई और ताराबाई शिंदे ऐसी ही साहसी महिलाओं में शामिल हैं।
सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में गिना जाता है। उस समय जब महिलाओं की शिक्षा को समाज में स्वीकार नहीं किया जाता था, उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल शुरू किया। अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर उन्होंने शिक्षा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का अभियान शुरू किया। उन्हें कई बार अपमान और विरोध का सामना करना पड़ा, यहाँ तक कि स्कूल जाते समय लोगों द्वारा उन पर गोबर और कीचड़ तक फेंका जाता था।
बावजूद इसके उन्होंने अपना मिशन नहीं छोड़ा। उनका मानना था कि शिक्षा ही समाज में समानता का सबसे प्रभावी साधन है। इसी तरह पंडिता रमाबाई भी अपने समय की अत्यंत विद्वान और प्रगतिशील महिला थीं। उन्हें संस्कृत और धार्मिक ग्रंथों का गहरा ज्ञान था, जिसके कारण उन्हें “पंडिता” की उपाधि मिली।
उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज में महिलाओं की स्थिति पर गंभीर प्रश्न उठाए। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “द हाई-कास्ट हिंदू वुमन” (1887) ने बाल विवाह, विधवाओं की दयनीय स्थिति और महिलाओं के सामाजिक उत्पीड़न को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया। वहीं ताराबाई शिंदे ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “स्त्री-पुरुष तुलना” (1882) के माध्यम से समाज में मौजूद लैंगिक भेदभाव और दोहरे नैतिक मानदंडों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने सवाल उठाया कि समाज पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग नैतिक नियम क्यों बनाता है। उनके विचार अपने समय से काफी आगे माने जाते हैं।
भारत में सामाजिक सुधार की कहानी अक्सर पुरुष समाज सुधारकों के दृष्टिकोण से सुनाई जाती रही है। हालांकि उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि उन महिलाओं को भी याद किया जाए जिन्होंने अपने साहस और विचारों से समाज को नई दिशा दी।
सावित्रीबाई फुले, पंडिता रमाबाई और ताराबाई शिंदे जैसी महिलाओं ने यह साबित किया कि महिलाएँ केवल सुधार की विषयवस्तु नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं सामाजिक परिवर्तन की वाहक भी हो सकती हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए साहस, दृढ़ता और निरंतर संघर्ष की आवश्यकता होती है



