ईरान-इजराइल की जंग में फंसा भारत, सोनिया गांधी के एक लेख ने हिला दी केंद्र की सियासत

Sonia Gandhi on Khamenei Death: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद भारत में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस की दिग्गज नेता और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हाल ही में एक विश्लेषणात्मक लेख में इस घटना पर अपनी संवेदनाएं साझा की हैं और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

भारत की चुप्पी पर सवाल

सोनिया गांधी ने कहा कि खामेनेई की हत्या के बाद नई दिल्ली की मौन प्रतिक्रिया चिंता का विषय है। उनका कहना है कि सरकार की चुप्पी सिर्फ तटस्थ नहीं बल्कि एक संदेश भी देती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह समय ऐसा है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की विदेश नीति और नैतिक स्थिरता का परीक्षण हो रहा है।

सोनिया गांधी ने बताया कि अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए टारगेटेड स्ट्राइक के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय में तनाव फैल गया है। इस घटना का असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं बल्कि पूरे एशिया और ग्लोबल साउथ में महसूस किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक नेताओं की प्रतिक्रिया और भारत की चुप्पी दर्शाती है कि देश की विदेश नीति में भरोसे और नैतिक विचारधारा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

भारत-ईरान संबंधों की अहमियत

लेख में सोनिया गांधी ने भारत-ईरान संबंधों की रणनीतिक और सांस्कृतिक अहमियत पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने याद दिलाया कि 1994 में ईरान ने कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय दबाव को रोकने में भारत का सहयोग किया था। साथ ही, ईरान ने पाकिस्तान की सीमा पर भारतीय कूटनीतिक उपस्थिति को भी सुनिश्चित किया था, जो ग्वादर पोर्ट और सीपीईसी के संतुलन के लिए महत्वपूर्ण था।

सोनिया गांधी ने किया अटल बिहारी वाजपेई दौरे का जिक्र

सोनिया गांधी ने 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के तेहरान दौरे का उल्लेख किया, जिसमें भारत और ईरान के संबंधों की गर्मजोशी से पुष्टि हुई थी। उनका कहना है कि वर्तमान सरकार को यह दृष्टिकोण याद रखना चाहिए, जबकि हाल के वर्षों में भारत-इजराइल संबंध तेजी से बढ़े हैं। उन्होंने कहा कि भारत के पास ईरान और इजराइल दोनों के साथ संबंध बनाए रखने का अवसर है, लेकिन यह भरोसे और सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए।

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सोनिया गांधी ने विश्लेषण किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया इजराइल दौरा और वहां दिए गए समर्थन ने इस घटना के समय भारत की नैतिक स्थिति पर सवाल खड़ा किया। गाजा संघर्ष में आम नागरिकों की मौत और वैश्विक नाराजगी के बीच भारत का हाई प्रोफाइल समर्थन कुछ देशों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

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