पति, पत्नी और वो: खुशहाल घर बर्बाद कर रहा है ‘तीसरा’, कहीं आपका पार्टनर आपको धोखा तो नहीं दे रहा

पति, पत्नी और वो: गृहस्थ जीवन में अशांति का एक मुख्य कारण अक्सर ‘वो’ होता है। इसके चक्कर में खुशहाल जिंदगी धीरे-धीरे बर्बाद होने लगती है। रिश्तों में दगाबाजी चाहें पति करे या पत्नी, मगर इसका खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है। कई बार मासूम बच्चों की जिंदगी पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। दांपत्य संबंधों में आपसी समझ एवं अटूट भरोसा होना बेहद जरूरी है।
ऐसे में जीवन साथी की निगरानी के लिए जासूसी एजेंसियों की मदद लेने का चलन बढ़ा है। मुंह मांगी रकम मिलने से यह एजेंसियां मालामाल हो रही हैं। सर्वे बताता है कि विवाहेत्तर संबंधों की पड़ताल में काफी संख्या में शक यकीन में बदल रहा है। यानी शादी के बाद भी पति या पत्नी दूसरे रिश्ते को ‘ना’ नहीं बोल पा रहे हैं। आधुनिक समाज में यह स्थिति वाकई चिंताजनक है।
भारत में तेजी से चल रहा है ये ट्रेंड
भारत की संस्कृति एवं सभ्यता ने हमेशा दुनिया को अचंभित किया है। हमारी संस्कृति जोड़ने की रही है, दूसरे का नुकसान करने की नहीं। पिछले कुछ साल में लिव इन रिलेशनशिप के प्रचलन ने जोर पकड़ा है। महानगरों में युवा कपल रेंट पर फ्लैट लेकर पति-पत्नी की भांति रहने लगते हैं। इन कपल की सच्चाई तब उजागर होती है, जब कोई हादसा या वारदात हो जाती है। यह चिंताजनक है कि जिन जीवन मूल्यों, संयम व शुचिता के रिश्तों के लिए भारत दुनिया में जाना जाता था, वहां आज यौन स्वच्छंदता व विवाहेत्तर संबंधों का दायरा बढ़ रहा है।
एक समय था कि भारतीय संयुक्त परिवार की छांव में संयमित व मर्यादित व्यवहार करते थे। बड़ों का अनुशासन मर्यादा की रक्षा करता था। कामकाज का स्वरूप और स्थानीय रोजगार भी जीवन व्यवहार को संतुलित व संयमित करते थे, मगर कार्य संस्कृति में बदलाव व देश-विदेश में कामकाज के लिए बाहर जाने के बाद व्यक्ति स्वच्छंद व्यवहार करने लगा।
नतीजन विदेश में रहने वाले पति या पत्नी के व्यवहार की पड़ताल के लिए जासूसी एजेंसियों की सहायता लेने के मामले निरंतर सामने आए हैं। जिसके बाद मुकदमेबाजी, अलगाव व टकराव की खबरें सामने आने लगती हैं। भारतीय समाज में व्यक्ति के सार्वजनिक व्यवहार को संयुक्त परिवार व समाज संयमित करता था, मगर धीरे-धीरे आर्थिक आत्मनिर्भरता के बाद नागरिकों ने बड़े-बुजुर्गों व समाज के हस्तक्षेप को अस्वीकार करना शुरू कर दिया। पूर्व में फिल्मों व टीवी निर्माताओं ने दर्शकों की भीड़ जुटाने हेतु हमेशा असामान्य वैवाहिक रिश्तों को अपनी कथावस्तु बनाया।
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इन असामान्य रिश्तों को इस ग्लैमर के साथ पेश किया जाता रहा है कि कालांतर उसका प्रभाव समाज पर नजर आने लगा। आज तो विदेशी धरती से संचालित इंटरनेट व सोशल मीडिया ने तो असामान्य रिश्तों की पराकाष्ठा दर्शा दी। मीडिया ने भी ऐसी नकारात्मक प्रवृत्तियों को इतनी तरजीह दी कि समाज के एक तबके में असामान्य रिश्तों को सामान्य माना जाने लगा।
भारतीय संस्कृति को इस चीज ने पहुंचाई सबसे ज्यादा छति
एक सच्चाई यह भी है कि देश पर तमाम विदेशी आक्रांताओं ने भारतीय संस्कृति को इतनी क्षति नहीं पहुंचाई होगी, जितनी इंटरनेट व सोशल मीडिया के जरिए परोसी जा रही अपसंस्कृति ने विकृतियां पैदा की। विवाह एक पवित्र बंधन है। जिसका निर्वहन संयम, सहजता, सहयोग, धैर्य और त्याग से ही होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं नई पीढ़ी लगातार धैर्य खोती जा रही है।
रिश्तों के दीर्घकालिक निर्वहन का मूल मंत्र यही है कि हम जीवन-साथी की छोटी-मोटी कमियों को नजरअंदाज कर सामंजस्य के साथ जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाएं। असामान्य रिश्तों का अल्पकालिक सुख बेशक लुभाता हो, मगर उसकी कीमत परिवार को लंबे समय तक चुकानी पड़ती है।



