वर्दी पर दाग: बहादुरी के चर्चे से रिश्वत की कालिख तक, दरोगा भुवनेश्वरी सिंह के पतन की कहानी

महिला दरोगा भुवनेश्वरी सिंह की गिरफ्तारी ने गाजियाबाद में खाकी की छवि को दागदार किया है। एंटी करप्शन की टीम ने उन्हें 45 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा है। दंपति के आपसी विवाद में पत्नी की तरफ से पति के खिलाफ दर्ज कराई गई एफआईआर की जांच के सिलसिले में दरोगा ने आरोपी पक्ष से संपर्क साधा था। बाद में आरोपियों को बचाने के नाम पर एक लाख रुपए रिश्वत की डिमांड की गई थी।

वायरल फोटो से हुआ राजफाश

मामला एंटी करप्शन विभाग तक पहुंच गया। अन्यथा दरोगा की जेब गर्म हो जाती। हाथी के दांत खाने के और तथा दिखाने के और होते हैं। यह चर्चित कहावत दरोगा भुवनेश्वरी पर सटीक बैठती है। ज्यादा समय नहीं गुजरा था, जब एनकाउंटर में घायल बदमाश को सहारा देकर पुलिस की गाड़ी तक ले जाती भुवनेश्वरी की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी।

बदमाश के साथ मुठभेड़ के दौरान भुवनेश्वरी भी पुलिस टीम का हिस्सा थीं। बाद में उन्हें काफी सराहना मिली थी। वह साहसी दरोगा आज रिश्वतखोरी की तोहमत लगने के बाद सलाखों के पीछे पहुंच चुकी हैं। उन्हें सस्पेंड कर विभागीय जांच आरंभ कर दी गई है। जानकारी यह भी सामने आई है कि भुवनेश्वरी सिंह इसके पहले भी रिश्वत मांगने के आरोप में अरेस्ट हो चुकी हैं। यानी उन्हें रिश्वत वसूलने का पुराना रोग है। महिला दरोगा के कारनामे से समूचा महकमा शर्मसार है। वैसे पुलिस विभाग में रिश्वतखोरी का चलन कोई नई बात नहीं है।

अपना जायज या नाजायज काम कराने के लिए जिन्होंने पुलिस को रिश्वत दी है, वह सच्चाई को भली भांति जानते हैं। समाज में शांति एवं कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी पुलिस के कंधों पर होती है। पुलिस और नागरिकों के मध्य सौहार्द पूर्ण रिश्तों की जरूरत पर हमेशा जोर दिया जाता रहा है। इसके बावजूद न पुलिस का व्यवहार आज तक सुधर पाया है, ना ऐसे नागरिकों की कमी है, जो अपना काम निकालने को रिश्वत देने के लिए उतावले रहते हैं। फरियादियों के साथ अभद्र बर्ताव और रिश्वतखोरी के कारण पुलिस विभाग की छवि सबसे ज्यादा खराब होती है।

यूपी में आए दिन आते रहते हैं ऐसे केस

उच्चाधिकारी समय-समय पर मातहतों को आवश्यक दिशा-निर्देश देते हैं, मगर हालात नहीं बदल पाते हैं। यूपी में आए दिन रिश्वतखोर अधिकारी या कर्मचारी रंगे हाथ पकड़े जाते हैं। इस कृत्य के लिए उन्हें जेल जाना पड़ता है। विभागीय जांच का सामना करना होता है। घर-परिवार और रिश्तेदारों के अलावा समाज में छवि खराब होती है, मगर भुवनेश्वरी जैसे पुलिसकर्मी ठोकर लगने के बाद भी सुधरने को तैयार नहीं होते हैं। गाजियाबाद में तैनात रहीं महिला थाना प्रभारी लक्ष्मी चौहान का कारनामा अक्सर याद आ जाता है।

लक्ष्मी चौहान पर बरामदगी की मोटी रकम में से गबन करने का आरोप लगा था। उस समय वह लिंक रोड थाने की कमान संभाल रही थीं। कुछ दिन पहले गाजियाबाद की एक महिला पुलिस अधिकारी उस समय चर्चाओं में आ गई थीं, जब वह अपनी टीम के साथ रात्रि में गरीबों को कंबल बांटने निकली थीं। सोशल मीडिया पर उनके इस कार्य की काफी सराहना की गई थी।

दिनदहाड़े सड़कों पर फर्राटा भर रहे ओवरलोड मोरंग डंपर

चूंकि गाजियाबाद में काफी समय बाद नागरिकों को पुलिस का वह मानवीय चेहरा देखना को मिला था, जिसकी उम्मीद की जाती है, मगर पुलिस विभाग का कोई कार्मिक जब गैरकानूनी कार्य में लिप्त मिलता है तो नागरिकों को निराशा होती है। महकमे की छवि खराब होने पर उन ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी व कर्मचारियों की भावनाएं भी आहत होती हैं, जो दिन-रात अच्छे कार्य में तल्लीन रहते हैं।

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