एक डॉलर यानि 90 रुपए; मोदी सरकार में रुपया 55% क्यों गिरा, जानिए असली वजह

आजकल देश में डॉलर की कीमत लगातार बढ़ रही है और इसके साथ ही रुपया गिरता जा रहा है। यह स्थिति केवल एक संयोग नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं से जुड़ा हुआ है। हम सब जानते हैं कि जब डॉलर की कीमत बढ़ती है, तो रुपया कमजोर होता है। क्या यह केवल एक तात्कालिक समस्या है या यह एक और बड़ी आर्थिक तस्वीर का हिस्सा है?
डॉलर के बढ़ने का मतलब
रुपये की गिरावट के साथ डॉलर का बढ़ना किसी अर्थशास्त्री के लिए कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ वर्षों से यह सिलसिला लगातार जारी है। खासकर 2014 के बाद से जब नरेंद्र मोदी की सरकार बनी, तब से रुपये की गिरावट और डॉलर का उभार लगातार चर्चा में है। कई बार यह सवाल उठता है कि आखिर इस गिरावट से आम जनता पर क्या असर पड़ रहा है?
रुपये की गिरावट से केवल विदेशी मुद्रा रिजर्व्स ही प्रभावित नहीं हो रहे बल्कि आयात पर निर्भर उद्योगों की लागत भी बढ़ रही है। इसका सीधा असर हर आम आदमी की जेब पर पड़ता है। पेट्रोल, गैस, खाद्य पदार्थ और अन्य आयातित सामानों की कीमतों में वृद्धि हो रही है, जिससे जीवन स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
2014 से 2025 तक का सफर
2014 में जब रुपया 58 के आसपास था, तब विपक्ष ने इसे लेकर खूब हंगामा मचाया था। तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ आरोप लगाए गए थे कि वह आर्थिक नीतियों को ठीक से नहीं चला रहे हैं। लेकिन 2014 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए, तो उन्होंने इसे सुधारने का वादा किया था। इसके बावजूद, रुपये की गिरावट जारी रही और आज 2025 में रुपये की कीमत 90 के आसपास पहुंच चुकी है।
यह आंकड़ा बताता है कि 11 सालों में रुपये की कीमत लगभग 55 प्रतिशत गिरी है। यह तथ्य विपक्ष के लिए एक बड़ा मुद्दा बन गया है, जो सरकार की नीतियों को आलोचना करते हुए इसे देश की “ईज्जत” की गिरावट के रूप में पेश कर रहे हैं। वे दावा करते हैं कि जब रुपये का मूल्य गिरता है, तो देश की आर्थिक स्थिति भी कमजोर होती है।
विकास और डॉलर
कुछ लोग इसे विकास से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि अगर देश 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है, तो इसका मतलब है कि समृद्धि और धन की वृद्धि हो रही है। इस दृष्टिकोण से, डॉलर की बढ़ती कीमत को एक संकेत के रूप में देखा जा सकता है कि देश की आर्थिक ताकत बढ़ रही है।
इसके साथ ही, यह सवाल भी उठता है कि अगर भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहा है, तो क्या यह राष्ट्रीय विकास के लिए एक बाधा है? क्या डॉलर की बढ़ती कीमत देश के लिए एक अच्छा संकेत है या यह एक गंभीर समस्या को जन्म दे सकता है?
राजनीति और अर्थव्यवस्था का कनेक्शन
अब सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ डॉलर की कीमत बढ़ने से ही हमारी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है? क्या रुपया गिरने का मतलब यह है कि देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है? यह वही सवाल है, जो विपक्ष बार-बार उठाता है। उनका आरोप है कि सरकार केवल बड़े उद्योगपतियों के हित में काम कर रही है और आम जनता की समस्याओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।
सरकार के फैसले से करोड़ों परिवारों की भावनाएं आहत, जानें मनरेगा पर क्यों मचा बवाल
मोदी सरकार का कहना है कि वे देश को एक “विकसित राष्ट्र” बनाने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं और इसके लिए आर्थिक सुधार जरूरी हैं। इसके लिए विदेशी निवेश और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा की जरूरत है, जो कि डॉलर के साथ जुड़ी हुई है।



