अब सिर्फ 1 साल काम करने पर भी मिलेगी ग्रेच्युटी, इस आसान फॉर्मूले से करें अपना कैलकुलेशन

Benefits of Gratuity: नौकरी बदलते समय कई कर्मचारियों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि मुझे ग्रेच्युटी मिलेगी या नहीं? पहले, 5 साल की ज़रूरी नौकरी की वजह से कई कर्मचारी इस फ़ायदे से वंचित रह जाते थे। लेकिन, केंद्र सरकार के नए लेबर कोड ने यह पूरी तस्वीर बदल दी है। अब, सिर्फ़ एक साल की नौकरी के बाद भी कर्मचारी ग्रेच्युटी का हक़दार है। आइए, आसान गणित और नियम समझते हैं कि आप अपनी मौजूदा सैलरी में कितनी ग्रेच्युटी पा सकते हैं।
1 साल में ग्रेच्युटी का हक़, लेकिन ‘इन’ शर्तों का पालन करें
नए लेबर कोड का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि अब आपको ग्रेच्युटी पाने के लिए ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। आपको सिर्फ़ कंपनी में लगातार 1 साल काम करना होगा। अगर कर्मचारी ने काम के दौरान कोई लंबी छुट्टी, लंबा ब्रेक या नॉन-पेड गैप लिया है, तो इसका असर ग्रेच्युटी पर पड़ सकता है। इसलिए, 1 साल पूरा करने के साथ-साथ आपकी सर्विस का जारी रहना भी ज़रूरी माना जाता है। अगर कर्मचारी ने छह महीने से ज़्यादा काम किया है, तो नए नियमों के हिसाब से इसे पूरा 1 साल माना जाएगा। यानी 11 महीने काम करने के बाद भी आप ग्रेच्युटी का हक पा सकते हैं।
ग्रेच्युटी कैलकुलेट करने का आसान फ़ॉर्मूला
- सरकार ने ग्रेच्युटी की रकम तय करने के लिए एक तय फ़ॉर्मूला बनाया है, जिसे हर कंपनी को फ़ॉलो करना होता है।
- ग्रेच्युटी की रकम = फ़ाइनल बेसिक सैलरी*(15/26)* कुल सर्विस के साल
- यहां ’15’ आपकी सर्विस की वैल्यू मानी जाती है (साल में 15 दिन की सैलरी के आधार पर)।
- ’26’ महीने में काम करने के औसत दिन माने जाते हैं। (30 या 31 दिन की जगह 26 दिन क्योंकि महीने में 4 रविवार की छुट्टी मानी जाती है)।
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उदाहरण
- मान लीजिए किसी कर्मचारी की फ़ाइनल बेसिक सैलरी Rs. 30,000 है और उसने कंपनी में 1 साल काम किया है।
- बेसिक सैलरी: Rs. 30,000
- मैथ: Rs. 30,000* (15/26)*1
- अनुमानित रकम: यह रकम लगभग Rs. 17,307 होती है।
- इसका मतलब है कि सिर्फ़ एक साल की नौकरी के बाद भी एक कर्मचारी को ग्रेच्युटी के तौर पर अच्छी रकम मिल सकती है।
ग्रेच्युटी के फ़ायदे (Benefits of Gratuity)
ग्रेच्युटी की पूरी रकम टैक्स-फ़्री होती है। ग्रेच्युटी एक ‘थैंक यू’ रकम है जो कंपनी कर्मचारी की लंबी और ईमानदार सर्विस के लिए देती है। यह रकम ज़्यादा बेसिक सैलरी वाले कर्मचारियों के लिए नौकरी छोड़ते समय एक बड़ी फ़ाइनेंशियल मदद है। नए नियमों की वजह से, जो युवा लोग बार-बार नौकरी बदलते हैं और कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारी अब ज़्यादा फ़ायदेमंद स्थिति में हैं।



