inspector zende review: मनोज बाजपेयी की फिल्म कैसी
चार्ल्स शोभराज पर आधारित थ्रिलर 'इंस्पेक्टर ज़ेंडे' में मनोज बाजपेयी बनते हैं असली हीरो। जानिए कैसे पकड़ते हैं वो चतुर ठग कार्ल भोजराज को।

inspector zende review: क्या आपने कभी सोचा है कि असली ज़िंदगी के अपराधी फिल्मों से भी ज़्यादा रोमांचक हो सकते हैं? इंस्पेक्टर ज़ेंडे नाम की यह नई क्राइम थ्रिलर फिल्म उसी का बेहतरीन उदाहरण है। जब कुख्यात ठग कार्ल भोजराज (जिम सर्भ), जो कि चार्ल्स शोभराज का एक काल्पनिक रूप है, तिहाड़ जेल से भागकर मुंबई लौटता है, तो एक बार फिर शहर की फिज़ा में डर और रहस्य गूंजने लगता है।
अब जिम्मेदारी है तेज़-तर्रार और अनुशासित इंस्पेक्टर ज़ेंडे (मनोज बाजपेयी) की, जो इस चतुर ठग को पकड़ने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।
Movie review: नायक के रूप में पुलिस अधिकारी
भारतीय सिनेमा में हमने कई बार अपराधियों की कहानियां देखी हैं। मगर इंस्पेक्टर ज़ेंडे एक ताज़ा बदलाव लेकर आती है। यहां फोकस अपराधी पर नहीं, बल्कि उसे पकड़ने वाले सच्चे नायक पर है। इस फिल्म में 70 और 80 के दशक की मुंबई की पृष्ठभूमि को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है।
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इंस्पेक्टर ज़ेंडे ने न सिर्फ 1971 में बल्कि 1986 में तिहाड़ जेल से भागने के बाद भी भोजराज को फिर से पकड़ा था। यह कहानी बताती है कि कैसे बिना डिजिटल तकनीक के भी सिर्फ बुद्धि और अनुभव से एक पुलिसवाला एक अंतरराष्ट्रीय ठग को चकमा दे सकता है।
फिल्म में खास क्या
लेखक-निर्देशक चिन्मय डी. मंडलेकर ने इस फिल्म को गंभीर बायोपिक बनाने की बजाय एक मनोरंजक थ्रिलर के रूप में पेश किया है। उनकी कहानी में न केवल सस्पेंस है, बल्कि हास्य और भावना का भी बेहतरीन संतुलन है।
112 मिनट की यह फिल्म दर्शकों को एक ऐसी मुंबई की सैर कराती है जो आज के दौर से बिलकुल अलग है—बिना सीसीटीवी, बिना इंटरनेट और बिना आधुनिक जांच तकनीकों के।
फिल्म में मनोज बाजपेयी की एक्टिंग कैसी
फिल्म की जान है मनोज बाजपेयी का बेहतरीन अभिनय। उन्होंने इंस्पेक्टर ज़ेंडे के किरदार को सादगी, हिम्मत और व्यावहारिकता के साथ निभाया है। वह न तो किसी ओवरड्रामेटिक हीरो की तरह लगते हैं, न ही एक्शन में खोए हुए पुलिसवाले जैसे।
उनके अपोजिट, जिम सर्भ ने कार्ल भोजराज के किरदार को पूरी गहराई दी है। वह आकर्षक, चालाक और डरावने अंदाज़ में एक परफेक्ट क्रिमिनल के रूप में उभरते हैं।
सचिन खेडेकर डीजीपी पुरंदरे के रूप में कहानी में वरिष्ठता और गहराई लाते हैं। वहीं गिरिजा ओक, ज़ेंडे की पत्नी विजू के रूप में, फिल्म में भावनात्मक संतुलन बनाती हैं।
उनकी और मनोज बाजपेयी की केमिस्ट्री फिल्म को केवल एक चूहे-बिल्ली के खेल से आगे ले जाकर मानवीय संवेदनाओं से जोड़ती है।
फिल्म की खासियत: हल्का-फुल्का मगर सस्पेंस से भरपूर
इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है इसका टोन। यह ज़रूरत से ज़्यादा गहराई में नहीं जाती, न ही कहानी को भारी बना देती है। इसके बजाय, यह एक फैमिली फ्रेंडली थ्रिलर की तरह सामने आती है, जो मनोरंजन के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करती है।



